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नीतीश जी,कहाँ गया आपका 3C से समझौता न करने का दावा

  • गुलनाज़ हत्याकांड:
  • ज़रा सोंचिये।अगर लड़का लड़की की जाति इसके उलट होती तब क्या होता।तब यही खादी और खाकी की जोड़ी बवाल मचाये होती।
  • लव जिहाद से लेकिन कौन कौन एंगल ढूंढ लिया जाता।सरकार से लेकर नेता तक और बेशर्म,बिकी हुई और गोदी मीडिया और उसके जानवर टाइप भौंकते पत्रकार अपनी छाती से लेकर स्टूडियो का कोठा तक पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
  • पुलिस तुरंत सक्रिय होती,कार्रवाई भी होती और धर्म विशेष को क्या कुछ ना कहा जाता। गोदी मीडिया, सोशल मीडिया भेड़िया बनकर सक्रिय हो चुका होता।
  • लव जिहाद, कट्टरता , एक समुदाय से नफ़रत भरे पोस्ट, गालियों की बौछार से भरे पोस्ट सबके मोबाइल में पहुंच चुके होते, एक पूरे समुदाय को आतंकवादी बता दिया जाता।

 

@मेराज नूरी
पिछले कार्यकाल में क्राइम ,करप्शन और कम्युनलिज़्म यानी 3C से कोई भी समझौते ना करने का ढिंढोरा पीटने वाले बिहार के मुख्यमंत्री आदरणीय नीतीश कुमार की 7वीं बार की ताजपोशी के साथ ही 3C धराशायी हो गया है।करप्शन के मामले में मेवालाल की शक्ल में अपना पहला विकेट खो चुके नीतीश कुमार अब क्राइम की पिच पर भी बोल्ड होते दिखाई दे रहे हैं।इससे पहले की आप कोई दूसरा ट्रैक पकड़ लें आईये आपको बताते हैं 3C के एक और C यानि क्राइम को लेकर नीतीश कुमार की लापरवाही।
कहानी की शुरुआत होती है 30 अक्टूबर से जब श्रीमान नीतीश कुमार NDA के दूल्हा यानी मुख्यमंत्री के घोषित उम्मीदवार के तौर पर धुआंधार चुनावी प्रचार में व्यस्त थे।नीतीश कुमार अपनी हताशा में मर्यादा की हदें पार करते हुए कभी कुछ बोल रहे थे कभी कुछ।नीतीश जी अपने फुल चुनावी मोड में थे।वैशाली की धरती पर जन्मे पूर्व मुख्यमंत्रियों लालू और राबड़ी की बेटियां की संख्या हूबहू बताने वाले CM नीतीश को चुनावी बेला में उसी वैशाली की धरती पर एक बेटी को जिंदा जला जाने की भनक तक नहीं थी।या यूं कहिये वो जानना ही नहीं चाहते थे।इसकी वजह भी थी।वजह थी मुख्यमंत्री की कुर्सी।सवाल था कुर्सी का।अगली ताजपोशी का सपना था।नज़र तो 7 वीं बार मुख्यमंत्री बनकर रिकॉर्ड बनाने पर थी।भला उनको 20 वर्षीय वो बेबस,मजबूर,गरीब बेटी कैसे दिखती।वो कोई शुशांत टाइप का राजपूत नहीं थी।वो झांसे की रानी कंगना राणावत नहीं थी।जी हाँ, जब सुशासन बाबू पटना के जयप्रकाश हवाई अड्डे से हेलीकाप्टर उड़ान भड़ते थे तो बस और बस एक ही मकसद एक ही निशाना।कुर्सी,कुर्सी और सिर्फ कुर्सी।30 अक्टूबर की रात वैशाली जिले के देसरी थाने के रसूलपुर हबीब की गुलनाज खातून को गांव के ही कुछ दबंगों ने महज़ इसलिए मिट्टी का तेल छिड़क कर जिन्दा जला दिया क्योंकि गुलनाज ने छेड़खानी का विरोध किया था।दो आरोपियों सतीश और चंदन ने गुलनाज़ पर केरोसीन जालकर उसे आग लगा दी।गुलनाज पहले स्थानीय अस्पताल और फिर राजधानी पटना के PMCH में 15 दिन तक ज़िन्दगी और मौत से लड़ते हुए आखिरकार ज़िन्दगी की जंग हार गई।पन्द्रह नवंबर को गुलनाज ने PMCH में दम तोड़ दिया।

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सत्ता का खेल न बिगड़े इसलिए नीतीश सरकार की प्रशासन और पुलिस मामले को दबाने में लगी रही यहां तक कि एक भी अभियुक्त की पन्द्रह दिनों तक गिरफ्तारी भी नहीं हुई।कारण महज़ ये था कि अगर 30 अक्टूबर को मामला उछल जाता, बात मीडिया में आजाती तो सरकार की किरकिरी होती,इसलिए खादी और खाकी के गठजोड़ ने बात को जैसे तैसे निपटाने की कोशिश की।

उसी पन्द्रह नवंबर को जिस दिन बिहार की गद्दी पर नीतीश कुमार सातवीं बार विराजमान हुए।मरने के बाद गुलनाज़ का दो वीडियो सामने आया जिसमें उसने अपनी आपबीती बताई। अपने बयान में पीड़िता ने कहा था कि सतीश राय और चंदन राय ने मुझसे बदतमीजी करनी शुरू कर दी और फिर मुझपर केरोसीन डालकर मुझे आग लगा दी।वीडियो में बुरी तरह झुलसी पीड़िता कह रही है कि मैं देसरी थाने के रसूलपुर हबीब की हूं। कचरा फेंकने शाम के छह बजे जा रही थी तो रास्ते में विनय राय के बेटे सतीश राय ने मेरे ऊपर मिट्टी तेल डालकर आग लगा दिया। पुलिस को दिए बयान में युवती ने बताया कि उसके पिता की मौत हो चुकी है। मां सिलाई का काम करके घर चलाती है। सतीश राय उस पर प्यार और शादी के लिए दबाव डाल रहा था लेकिन वह नहीं मानी तो पहले उसे धमकाया गया। उसने छेड़खानी की शिकायत सतीश के घरवालों से की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।उसी पन्द्रह नवंबर को एक तरफ नीतीश कुमार 7वीं बार मुख्यमंत्री बनने की शपथ ले रहे थे तो दूसरी तरफ अपनी बच्ची के साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ पटना के करगिल चौक पर गुलनाज़ के परिजन बीच सड़क पर लाश रख कर इंसाफ मांग रहे थे।ये वो कहानी थी जिसपर क़ायदे से तो पहले ही दिन यानी 30 अक्टूबर से ही न्याय मिलता दिखाई देता लेकिन चुनावी फायदे के लिए और सुशासन की नकली बुनियाद को खिसकने से बचाने के लिए एक अल्पसंख्यक समुदाय की लड़की को जिंदा जलाये जाने की घटना को पुलिस प्रशासन और नेताओं राजनेताओं के द्वारा दबाकर रखा गया।सत्ता का खेल न बिगड़े इसलिए नीतीश सरकार की प्रशासन और पुलिस मामले को दबाने में लगी रही यहां तक कि एक भी अभियुक्त की पन्द्रह दिनों तक गिरफ्तारी भी नहीं हुई।कारण महज़ ये था कि अगर 30 अक्टूबर को मामला उछल जाता, बात मीडिया में आजाती तो सरकार की किरकिरी होती,इसलिए खादी और खाकी के गठजोड़ ने बात को जैसे तैसे निपटाने की कोशिश की।ज़रा सोंचिये।अगर लड़का लड़की की जाति इसके उलट होती तब क्या होता।तब यही खादी और खाकी की जोड़ी बवाल मचाये होती।लव जिहाद से लेकिन कौन कौन एंगल ढूंढ लिया जाता।सरकार से लेकर नेता तक और बेशर्म,बिकी हुई और गोदी मीडिया और उसके जानवर टाइप भौंकते पत्रकार अपनी छाती से लेकर स्टूडियो का कोठा तक पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ते।पुलिस तुरंत सक्रिय होती,कार्रवाई भी होती और धर्म विशेष को क्या कुछ ना कहा जाता। गोदी मीडिया, सोशल मीडिया भेड़िया बनकर सक्रिय हो चुका होता।  लव जिहाद, कट्टरता , एक समुदाय से नफ़रत भरे पोस्ट, गालियों की बौछार से भरे पोस्ट सबके मोबाइल में पहुंच चुके होते, एक पूरे समुदाय को आतंकवादी बता दिया जाता। मीडिया आपको बता रहा होता कि धर्म विशेष के लोग समाज के लिए कितना बड़ा ख़तरा हैं और सत्ताधारी पार्टी के नुमाइंदे जगह जगह ज़हर उगल रहे होते।और तो और सत्ता पाने के लिए जनता से वोट भी मांग लिए जाते। लेकिन यहां तो मामला उल्टा था सो उसे दबा दिया गया।अब जबकि खादी को सत्ता मिल चुकी है और खाकी को उसके आक़ा तो सत्ता से लेकर पुलिस तक कह रही है कार्रवाई चालू आहे,न्याय होगा,निष्पक्ष होगा,न्यायालय है।ये है वो है।ऐसा करेंगे वैसा करेंगे।लेकिन सवाल उठता है अब क्या ख़ाक करोगे जब चिड़िया चुग गयी खेत।जब एक मां से उसकी बेटी बिछड़ गयी।एक भाई से उसकी बहन। जानेवाली तो चली गयी।और हां,आप माने या ना माने, देश के अधिकतर मामलो में न्याय तभी जल्दी मिलता है जब वह घटना हाईलाइट होती है,सोशल मीडिया पर चर्चा होती है, वैशाली की घटना भी तभी चर्चा में आई जब बच्ची की मौत हो गई और लोगो ने घटना को लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर लिखा।कैंडल मार्च निकाला। तब जाकर पुलिस हरकत में आई है। घटना के जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया गया।ऐसे में अब देखने वाली बात ये है कि सुशासन का लीबादा ओढे बिहार के मुखिया वैशाली की बेटी को कहां तक न्याय दिला पाते हैं लेकिन इस घटना पर समय रहते कार्रवाई ना करने, चुनावी माहौल में मस्त सरकार और प्रशासन की चुप्पी और लानत मलामत के बाद नींद से जगने के पूरे एपिसोड ने नीतीश के 3C से समझौता ना करने के दावे की पूरी पोल पट्टी खोल कर रख दी है।

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