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महंगाई की मार:जिनकी थाली में एक ही तरकारी है उन्हें तो फ़र्क़ पड़ता ही है

नई दिल्ली:आज के समय में महंगाई को समझने के लिए किसी व्यक्ति को इन आंकड़ों की तरफ देखने या समझने की भी जरूरत नहीं है. बाजार में लोहे की कीमतें लगभग दोगुनी है, खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं (नींबू इसका प्रासंगिक उदाहरण है) और तेल की कीमतें 110 रुपये प्रति लीटर के आस-पास पहुंच चुकी हैं. बजट से पहले पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2022-23 के लिए 8-8.5% की विकास दर का अनुमान लगाया गया था और यह अनुमान अगले वित्त वर्ष में कच्चे तेल की कीमतों के 70-75 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहने की उम्मीद पर आधारित थी. आर्थिक सर्वेक्षण में आयातित महंगाई का जिक्र इसी संदर्भ में किया गया था और अब यह अनुमान सही साबित होता दिख रहा है. कच्चे तेल की कीमतें अभी भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इसमें अगले कुछ महीनों तक कमी आने की उम्मीद नहीं है. खुदरा महंगाई या सीपीआई दर 6 फीसदी के सुविधाजनक स्तर को पार कर गई है और कोर इन्फ्लेशन (खाद्य और तेल को हटाकर) भी 10 फीसदी से अधिक है. आरबीआई ने इसी वजह ग्रोथ से फोकस को हटाते हुए महंगाई पर ध्यान केंद्रित किए जाने की बात की है और यह असली चिंता है. महंगाई की दर बैंकों की तरफ से जमा बचत पर मिलने वाली ब्याज से अधिक है और यह रुपये की कीमत को कम कर रही है. इसे ऐसे समझिए कि अगर 100 रुपये पर आपको छह रुपये का ब्याज मिल रहा है, तो उसी अवधि में 100 रुपये के वस्तु की कीमत छह रुपये से अधिक हो जा रही है. इसलिए महंगाई एक बड़ा मुद्दा है और यह सीधे सीधे देश की बड़ी आबादी को प्रभावित करते हुए उनकी थाली के आकार को तय करता है. जिनकी थाली में कई व्यंजन है, उनमें से एक के कम होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन जिनकी थाली में दो या तीन ही व्यंजन है, उसमें से एक के कम होने से बड़ा असर पड़ता है.

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