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नीतीश कुमार की चुप्पी और बिहार की सियासत

प्रियांशु

99 फ़ीसदी राजद समर्थक चाहते है नीतीश उनके पाले में आ जाएं। 2015 की तरह महागठबंधन का निर्माण हो, नीतीश मुख्यमंत्री रहें और समय मिलते ही तेजस्वी यादव को अपना कार्यभार सौंप कर कहीं विलीन हो जाए।
जदयू वाले भी कमोबेश यही ख्वाहिश रखते है, वो भी जानते है उनका सियासी भविष्य लल्लन सिंह और आरसीपी सिंह के आपसी वर्चस्व की भेंट चढ़ने वाला है। जबकि 99 फीसदी भाजपा वाले नीतीश से नफरत करते है, वो ये तो चाहते है कि नीतीश उनके साथ रहें लेकिन ये भी चाहते है उनका अपना आदमी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए।
दरअसल बिहार ने पिछले 30 वर्षों के सैद्धांतिक लड़ाई में यही कमाया है। जदयू-राजद एक दूसरे का विरोध करके भी एक दूसरे में मिल जाने के लिए बेचैन रहती है। भाजपा-जदयू साथ रहकर भी मुहब्बत का बीज नहीं उगा पाती। यही वो पॉलिटिकल स्टैंड है जिसका हमेशा जिक्र किया जाता है।
यह पूरी लड़ाई केवल एक आदमी के ऊपर केंद्रित है। वो आदमी जो दो दशक से सत्ता के केंद्र में है। आप उनकी उपस्थिति को नजरंदाज कर देते है, वो एक बड़ी चुप्पी लिए और बड़े बन जाते है।

(लेख लेखक के फेसबुक पेज से लिया गया है)

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