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आरामदायक वस्त्र क्या सिर्फ़ पुरुषों की ज़रूरत है?

मेहजबीं

जिन वस्त्रों में महिलाओं को आराम रहता है। वो क्यों नहीं पहन सकती ?भौगोलिक स्थिति के हिसाब से वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से महिलाएं क्यों नहीं पहन सकती कपड़ें ?बहुत महिलाओं की ज़िन्दगी से ये सवाल मिट गये हैं। मगर अभी भी लाखों हैं जो इन सवालों से घिरी हुई हैं।
हल्दी मेहंदी के फंग्शन के लिए, मय्यत वाले माहौल के लिए पीले हरे सुफेद कपड़े तो मिल गये। मगर वो कपड़े जिनमें आराम है वो क्यों नहीं मिलते ?”मेक्सी पहनकर बालकनी में मत जाओ,छत पर मत जाओ।” बेचारी औरत दिन भर मेक्सी और सूट साड़ी बदलती रहती है। जब भी उसे छत पर जाना हो बालकनी में जाना हो। तंग आकर पहनना छोड़ देती हैं। मुलायम ढीले कपड़े सिलवा लो तो। “इसमें अच्छी नहीं लगती।”ये कोई तरीका है बहू का।””ये कोई ढंग है! पति के सामने तो बनसंवर कर रहना चाहिए।”

मैं यहाँ नग्न या अर्धनग्न होने का फेवर नहीं कर रही। स्पष्ट इसलिए कर रही हूँ कि महिलाओं के आरामदायक वस्त्रों की बात अगर कोई करता है। तो उसको यही कहकर चुप कराया जाता है कि आप नग्नता अर्धनग्नता का समर्थन कर रहे हैं। यहाँ सतर खोलने ढकने की बात नहीं हो रही है।

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आज भी लाखों घरों में महिलाओं को आरामदायक वस्त्र पहनने की इजाज़त नहीं न घर में न घर से बाहर। वो हर वक़्त साड़ियों में अच्छी ड्रेस में रहें। पति शाम को आए तो उनके सामने स्मार्ट बनी रहें। बहूओं को बीवियों को यही समझाया जाता है। आधे से ज़्यादा पति भी यही चाहते हैं।

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पुरुष बाहर तो स्मार्ट बनते हैं ब्राडेंड वस्त्र पहनकर। घर में बीवियों के सामने हर वक्त लूंगी तौलिया बनियान में रहते हैं। क्यों रहते हैं ? उनका जवाब है अपने आराम के लिए। बाहर तो मजबूरी में पहनने हैं अच्छे वस्त्र। भला घर तो अपना है, घर में भी आराम मेहसूस न हो। बात तो ठीक है। मगर यही बात औरतों के लिए ग़लत कैसे हो जाती है ? जब वो घर में मेक्सी पहनती है, मुलायम ढीले वस्त्र पहनती है। उनको सबके सामने स्मार्ट बनकर ही रहना है। ख़ासकर पति के सामने।पुरुष बाहर सबको अच्छे लगें…मगर बीवियों को हक़ नहीं सौन्दर्य बोध का आनंद लें। हुस्ने नज़र से शोहर को देखें। वो बेचारी उसके नसीब में पति को लूंगी बनियान तौलिए में देखना है।

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वहीं दूसरा पहलू भी है… आज भी लाखों घरों में महिलाओं को आरामदायक वस्त्र पहनने की इजाज़त नहीं न घर में न घर से बाहर। वो हर वक़्त साड़ियों में अच्छी ड्रेस में रहें। पति शाम को आए तो उनके सामने स्मार्ट बनी रहें। बहूओं को बीवियों को यही समझाया जाता है। आधे से ज़्यादा पति भी यही चाहते हैं।

महिलाएं रसोई में भी गर्मी में वही अच्छे स्मार्ट लगने वाले कपड़े पहने। नाटकों में और भी मदद की इस ग़ैरबराबरी पर आधारित सोच को ढोने में। खैर नाटकों में तो मर्द भी हर वक़्त शियाराम विमल के पेंट कोट टाई पहने रहते हैं। नाटकों की यह बेवकूफी मर्दों ने फॉलो नहीं की। औरतें शौक़ में भी और जबरदस्ती भी इस बेवकूफी को फॉलो कर रही हैं।पुरुष घर में आराम देने वाले वस्त्र पहनते हैं। आराम सिर्फ़ मर्दों के लिए ज़रूरी है ?सौन्दर्य बोध का आनंद लेने का हक़ सिर्फ़ मर्दों को है ?कबतक औरतों को सब जगह स्मार्ट बने रहने के लिए बेआराम कपड़े पहनने पड़ेंगे।

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बहुत से घरों में परिवर्तन आया है। अब महिलाएं भी आरामदायक कपड़े पहनने लगी हैं। उनके पति उन्हें हर वस्त्र में पसंद करते हैं। उनकी ड्रेसिंग सेंस पर कंट्रोल नहीं रखते बल्कि उनकी चॉइस पर छोड़ते हैं।मगर आधे से ज़्यादा मर्द आज भी पत्नी की ड्रेस ख़ुद तय करते हैं। या अपनी माँ बाप के कहे अनुसार तय करते हैं। मध्यवर्गीय परिवार में ये सबसे ज्यादा होता है। और पढ़े लिखे लोग ऐसा करते हैं। आप जैसे पुरुष पढ़कर पैसों का ढेर लगा दें। मगर सोच से आप तंग ही रहेंगे। असमानता आपके चरित्र से जाएगी नहीं। आप प्रगतिशील नहीं। पितृसत्तात्मक सोच को ढो रहे हैं।पुरुषों से कोई उनकी ड्रेसिंग सेंस के बारे में कूछ बोल दे तो दो टूक जवाब दे देते हैं।”हमारी मर्जी,हम जो चाहे करें। हमें जो अच्छा लगेगा, हमें जिसमें आराम है हम वो करेंगे पहनेंगे।”पुरुष अपनी चॉइस अपने आराम में किसी दूसरे की दख़ल बर्दाश्त नहीं करते।वहीं जब उनकी पत्नी की ड्रेसिंग सेंस की बात होती है। तब वो पत्नी को कुछ नहीं समझते, रिश्तेदार भाई बहन माँ अपने ख़ूद के हिसाब से उसकी ड्रेस तय करते हैं।

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