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संजय सिन्हा
बहुत पुरानी बात है। मैं परिवार के साथ अहमदाबाद छोटे भाई के घर गया था। अक्तूबर का महीना था। हवा में थोड़ी ठंड घुलने लगी थी। एक रात हम दोनों भाइयों का परिवार देर रात किसी रेस्त्रां में खाना खाने गया। जहां हम गए थे, वहां लड़कों की टोली खाने की मेज पर खाते हुए हंसी-ठट्ठा कर रही थी। मैंने अपने भाई से कहा कि हमें यहां से चलना चाहिए। ये जगह मुझे ठीक नहीं लग रही है।मेरा छोटा भाई हंसा। वो समझ गया कि संजय सिन्हा उन लड़कों को देख कर रेस्त्रां से लौट रहे हैं।भाई ने मुझसे कहा कि भैया, ये दिल्ली नहीं है। ये अहमदाबाद है। यहां महिलाओं के साथ आप देर रात घूम सकते हैं, खाना खा सकते हैं। आपके दिल में उत्तर भारत की छवि बैठी है, जहां अकेली महिला देर रात तक घूम नहीं सकती, स्कूटर नहीं चला सकती है। जहां उसे हर बार लड़कों की छींटाकशी का शिकार होना पड़ता है। क्योंकि आपने वही देखा है इसलिए आप घबरा रहे हैं। आप आराम से बैठिए। ये लड़के अपनी मस्ती कर रहे हैं, हमें तंग नहीं करेंगे, न महिलाओं को छेड़ेंगे। यहां लड़कियां अेकेली स्कूटी, मोपेड पर लेट नाइट फिल्म देख कर सुरक्षित घर लौट सकती हैं।

 

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भाई की बात सही थी। मेरे मन में दिल्ली की तस्वीर बैठी थी। वहां देर रात अकेली महिलाओं को घूमते मैंने नहीं देखा था। परिवार के साथ भी महिलाएं देर रात महफूज नहीं महसूस करती थीं। देर रात इस तरह के रेस्त्रां में आंखों की बदतमीजी तो आम बात मैंने ही देखी थी। मैं इतने साल दिल्ली में रहा था, मैंने कभी देर रात किसी महिला को स्कूटी पर अेकली फिल्म देख कर लौटते नहीं देखा था। मैंने दिल्ली में पुरुषों को तो टू व्हीलर चलाते बहुत देखा था, पर महिलाओं को नहीं। मुझे नहीं पता कि वो कौन-सी अड़चन या संस्कार जनित समस्या रही होगी, जब उत्तर भारत के पुरुषों की आंखें महिलाओं को देख कर एक्स-रे मशीन बन जाती हैं।

 

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मैं इंदौर,भोपाल, बड़ौदा, पुणे, जयपुर जैसे शहरों में खूब घूमा हूं। वहां महिलाएं टू व्हीलर पर अकेली खूब घूमती दिखती हैं। पर दिल्ली में नहीं। मैंने कई लोगों से पूछा कि दिल्ली में क्या समस्या है? आखिर दिल्ली देश की राजधानी है, उसे तो इन मामलों में अधिक उदार होना चाहिए था। पर नहीं है। क्यों?
मैंने मुंबई में महिलाओं को देर रात अकेली लोकल ट्रेन में सफर करते, ऑटो या टैक्सी में यात्रा करते देखा है। पर दिल्ली में नहीं। अगर किसी को मजबूरी में ऐसा करना भी पड़े तो सचमुच वो दहशत की घड़ी होती है। हो सकता है आज मेरा ऐसा कहना कुछ लोगों को नागवार गुजरे, कह बैठें कि संजय सिन्हा आप कहां की बात कर रहे हैं? दिल्ली बहुत आधुनिक है।
होगी दिल्ली आधुनिक। होंगे वहां बड़े-बड़े मॉल। पर पता नहीं क्यों वहां महिलाओं के प्रति पुरुषों में वो संजीदगी नहीं दिखती, जो मुझे मध्य भारत और पश्चिम भारत में दिखती है। वैसे आज मुझे ये कहानी नहीं सुनानी थी। न ही कोई वजह थी इस बारे में चर्चा की। पर कल जबलपुर में घूमते हुए मेरी नज़र एक स्कूटी चलाती महिला पर पड़ी। जबलपुर में महिलाएं स्कूटी खूब चलाती हैं। मेरी तस्वीर की खूबी महिला नहीं। खूबी ये दिखी कि महिला स्कूटी चला रही थी और पुरुष चैन से पीछे बैठा था।
संजय सिन्हा को तो आप जानते हैं। एक तस्वीर में हज़ार शब्द ढूंढ सकते हैं। मुझे बहुत राहत भरी तस्वीर लगी ये।
आपको इसमें हैरानी शायद न लगे। आप में से कुछ लोग इस तस्वीर में शायद ट्रैफिक नियमों की अनदेखी भी देख लें कि दोनों में से किसी ने हेलमेट नहीं लगाया। लगाना चाहिए था। पर जिस आत्मविश्वास से महिला स्कूटी चला रही थी और जिस सुकून से पुरुष पीछे बैठा था, उससे मुझे बहुत खुशी मिली।
ये है असल विकास। सड़कें चाहें जितनी चमचमाएं, स्पीड चाहे जितनी बढ़ जाए, पर असल विकास की तस्वीर यही है कि महिलाओं के हाथ में कमान हो और पुरुष चैन से बैठ सके। हो सकता है ये तस्वीर अपवाद हो, लेकिन सच्चाई यही है कि जिस समाज में महिलाओं के हाथ में स्टेयरिंग देकर चैन से पीछे बैठने का भाव मर्दों में आ जाएगा, वो समाज सही मायने में उन्नत होगा।देश के कई शहरों में ऐसी तस्वीर दिखती है। पर दिल्ली में नहीं, या बहुत कम। सच कहूं तो ये दिल्ली का दर्द है।जिस दिन दिल्ली की सड़क पर ऐसी तस्वीर आम दिखने लगेगी, मैं कह पाऊंगा- मेरी दिल्ली, मेरी शान।अभी तो मेरा जबलपुर महान ही मैं कह पा रहा हूं।

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