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प्रेम तो आंखों में है

कुलीना कुमारी
उस नजर में जिस नजर से हम सामने वाले को देखते हैं
उस समर्पण में भी जिसके लिए हम जीना चाहते हैं
उस त्याग में भी जहां झुकने में भी गाली नहीं लगती
मन प्रसन्न होता है

हां प्रेम हमारे आपके सबके दिल में हैं
पहचानने की देरी
कि इसी वजह से हमारा अस्तित्व
और इसीलिए भी हम जीवित रहना चाहते हैं

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प्रेम मंदिर जैसा पवित्र
या नि:शब्द होकर भी जिसका संदेश उसके अपने तक पहुँच जाता है

प्रेम दो दिलों को जोड़ता हुआ कोई अदृश्य सा तार
कि जिसके इशारे पर हम नाचना चाहते हैं

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प्रेम यज्ञ सा पवित्र कार्य
तो समापन जैसी प्रतिष्ठित भी यह
प्रेम शुरुआत तो सुखद अंत की लालसा भी
प्रेम स्वप्न तो साकार की आकांक्षा भी

प्रेम दिखावा नहीं
यह असलियत की पहचान
प्रेम जरुरत का नाम…

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