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जन्मदिन पर विशेष:शहीद अब्दुल हमीद के नाम की वह रात

ध्रुव गुप्त
आज भारतीय सेना के गौरव परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद अब्दुल हमीद का यौमे विलादत है। जब भी यह दिन आता है, मेरे मन में बाईस साल पहले की एक भयानक रात की स्मृतियां कौंध जाती हैं। तब मैं मुंगेर जिले का एस.पी हुआ करता था। आज ही के दिन आधी रात को शहर के नीलम सिनेमा चौक पर सांप्रदायिक दंगे की भयावह स्थितियां बन गई थीं। बेहद संवेदनशील माने जाने वाले उस चौक पर एक तरफ मुस्लिमों के मुहल्ले थे और दूसरी ओर हिंदुओं की घनी आबादी। चौक पर पहुंचकर मैंने देखा कि एक तरफ सैकड़ों मुसलमान जमा थे और दूसरी तरफ सैकड़ों हिन्दू। दोनों तरफ से उत्तेजक नारे लग रहे थे। बीच-बीच में बड़े-बड़े पटाखे भी छूट रहे थे।तमाम आशंकाओं के बीच मेरे साथ सुविधाजनक स्थिति यह थी कि शहर और जिले के लोग मेरा बहुत सम्मान करते थे। मैं साथी पुलिसकर्मियों के मना करने के बावज़ूद मुसलमानों के मुहल्ले में घुस गया। मुझे अपने बीच पाकर वे लोग शांत होने लगे। कुछ युवा मेरे पास आए तो मैंने बवाल की वजह पूछी। उन्होंने बताया कि वे चौक पर शहीद अब्दुल हमीद के स्मारक की बुनियाद रख रहे थे कि सैकड़ों हिन्दू जमा होकर उसे तोड़ने की कोशिश करने लगे। मैंने पूछा – ‘क्या आप लोगों ने स्मारक बनाने के लिए प्रशासन से अनुमति ली थी ? क्या हिंदुओं को पता था कि यहां किसके स्मारक की बुनियाद रखी जा रही थी ?’ मेरे सवालों पर वे बगले झांकने लगे। मैं समझ गया। मैंने उन्हें आश्वस्त किया – ‘चौक पर शहीद का स्मारक ज़रूर बनेगा और सबके सहयोग से बनेगा। आप लोग घर जाओ, मैं रात भर यहां रहकर बुनियाद की हिफाज़त करूंगा।’ कुछ ही देर में सभी मुस्लिम घर लौटने लगे। पटाखों की आवाज़ें इधर बंद हुई, मगर दूसरी तरफ अब भी आतिशबाज़ी हो रही थी।

 

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मैं हिंदुओं की तरफ गया तो उत्तेजित लोगों ने बताया कि जब उन्हें पता चला था कि मुसलमान शहर के व्यस्त चौराहे पर चोरी से किसी की मज़ार बना रहे हैं तो वे विरोध करने यहां पहुंचे हैं। मैंने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो पल भर में उनका गुस्सा काफ़ूर हो गया। मैंने उन्हें बताया कि संवादहीनता और ग़लतफ़हमी की वजह से ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी है। अब्दुल हमीद का नाम सुनकर इधर से भी आतिशबाज़ी बंद हो गई और लोग लौटने लगे। मैं एक अखबार बिछाकर प्रस्तावित स्मारक पर बैठ गया। सुबह तक चौक के पास रहने वाले शायर मित्र Anirudh Sinha ने चाय-पान का इंतज़ाम किया और कवि मित्र Shahanshah Alam हालचाल लेते रहे। सुबह लौटते समय मैंने शहीद को याद कर कहा – इन्हें माफ़ कर देना हमारे आज़ाद भारत के वीर अभिमन्यु, वे लोग नहीं जानते कि आपके नाम पर वे क्या करने जा रहे थे !आज मुंगेर के नीलम सिनेमा चौक पर आम लोगों के सहयोग से बना शहीद अब्दुल हमीद का स्मारक शान से खड़ा है जिसपर उनकी जयंती और शहादत दिवस पर न केवल सभी संप्रदायों के लोग पुष्पांजलि अर्पित करते हैं, बल्कि राष्ट्रीय पर्वों के दिन वहां झंडोत्तोलन भी होता है।

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