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शिवसेना ने अपनी स्थापना के साल भर बाद से ही विद्रोह देखना शुरू कर दिया था

पुष्परंजन

शिंदे सरकार बाधारहित गति से चल पाई तो उसकी अधिकतम आयु मानकर चलिये, दो साल तीन महीने। सामना में 30 जून 2022 को एक ख़बर समाचार समूह सकाल के सर्वे के हवाले से छपी, कि शिवसेना में फूट पड़ेगी। उस सर्वे में महाराष्ट्र के 46 प्रतिशत लोगों ने माना कि शिवसेना में एक और विभाजन होना है, मगर 43 प्रतिशत लोग अब भी यह मानने को तैयार नहीं। अर्थात, सर्वे में राय देने वाले बहुसंख्यक समूह ने स्वीकार किया कि बाला साहेब ठाकरे के समर्थक एक बार फ़िर बँट जाएंगे। सकाल के सर्वे में पूछा गया था कि क्या आप बाग़ी विधायकों को आगामी चुनाव में वोट देंगे? 76.3 प्रतिशत लोगों ने कहा, इन्हें नहीं देंगे वोट। 12.7 प्रतिशत लोग बोले, हम बाग़ियों को वोट देंगे। 11 फीसद ने कहा, ‘हमें नहीं पता।‘

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सर्वे की बात क्या सत्ताइस महीने बाद सौ टका सच साबित होगी? सकाल क्या, कोई भी सर्वे करने वाला ठोक के नहीं कह सकता। मगर, महत्वपूर्ण यह है कि सामना जैसे अख़बार ने विभाजन वाली बात को परोक्ष रूप से मान लिया है। 30 जून 2022 के संपादकीय में सामना ने लिखा, ‘औरंगाबाद का ‘संभाजीनगर‘ और उस्मानाबाद को ‘धाराशीव‘ करके मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने वचन पूरा किया है। अयोध्या से बाबर का नामोनिशान शिवसैनिकों ने हमेशा के लिए नष्ट कर दिया, उसी तरह औरंगाबाद का नाम महाराष्ट्र से मिटा दिया। इस पर महाराष्ट्र के मुसलमान भाइयों को भी अभिमान होना चाहिए।‘ ऐसे संपादकीय लिखने वाले को औरंगाबाद के मुसलमानों से पूछना चाहिए कि वो क्या वास्तव में खुश हैं? यों, देवेंद्र फडनवीस नामांतरण के लिए जिस तरह उद्धव ठाकरे को उकसाते रहे, जाते-जाते शिवसेना प्रमुख ने वह कार्य कर दिया, ताकि हिंदुत्व चेहरा सुरक्षित रहे।

शिवसेना के अनुषंगी संगठनों में युवासेना सबसे फ्रंटफुट पर खेलती है, जिसके अध्यक्ष हैं, आदित्य साहेब ठाकरे। महिला अघाड़ी, भारतीय कामगार सेना, स्थानीय लोकाधिकार समिति महासंघ जैसे तीन और अनुषंगी संगठन शिवसेना की ताक़त हैं। शिवसेना यदि बँटती है, तो इन संगठनों के कितने नेता अगले दो वर्षों में एकनाथ शिंदे के साथ होंगे? इसपर सर्वे या आकलन अभी की परिस्थिति में थोड़ा कठिन है। शिवसेना की वास्तविक सदस्य संख्या कितनी है? यह भी बंद मुट्ठी जैसी है। उद्धव ठाकरे के पास 55 में से क्या 13 विधायक रह गये हैं? 4 जुलाई के शक्ति परीक्षण में स्पष्ट हो जाएगा। मगर, शिवसेना के लोकसभा में 19 और राज्य सभा में तीन सांसदों में बंटवारा दिखाई देना बाक़ी है।

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अभी इसका भी आकलन होना बाक़ी है कि दो साल 213 दिन की साझा सरकार में कांग्रेस व एनसीपी ने क्या खोया, क्या पाया? कांग्रेस, ‘कोऊ नृप होई, हमैं का हानि‘ वाले निर्विकार भाव में दिख रही है। उनके आलाकमान ने कमलनाथ को मुंबई भेजकर खानापूर्ति कर ली। एक ऐसा ‘संकटमोचक‘, जो ख़ुद की सत्ता नहीं बचा पाया था। किंतु यह कह सकते हैं कि एनसीपी फ्रंट फुट पर लड़ती रही, जिसकी वजह से नवाब मलिक और अनिल देशमुख जेल में हैं। शरद पवार बोले, ‘ऐसी घटना साल 1981 में हमारे साथ भी घटित हुई थी। उस दौरान मैं 67 विधायकों को चुनकर लाया था। कुछ दिनों के लिए मैं महाराष्ट्र से बाहर गया और जब लौटकर आया, तो मेरे अलावा केवल पांच विधायक ही मेरे साथ थे। लेकिन अगले चुनाव में मैं फ़िर उसी संख्याबल पर पहुंच गया था।‘ शरद पवार के बूस्टर डोज बयान को सामना ने प्रमुखता से छापा है।

 

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शिवसेना ने अपनी स्थापना के साल भर बाद से ही विद्रोह देखना शुरू कर दिया था। 1967 में मलाड के यूनिट चीफ बलवंत मंत्री ने बाल ठाकरे के खिलाफ दादर में रैली निकाली थी। छगन भुजबल से लेकर राज ठाकरे तक शिवसेना के लिए छोटे-मोटे भूस्खलन जैसे थे। मगर, इस बार भूचाल आया है, जिसने दादर स्थित शिवसेना भवन की चूलें हिला दी हैं। एक बात तो माननी होगी, उद्धव ठाकरे चाहकर भी अपने पिता जैसा आक्रामक नहीं बन सकते।

 

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उद्धव ठाकरे शिवसेना के तीसरे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपना टर्म पूरा नहीं किया। 14 मार्च 1995 को मनोहर जोशी शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री बने। तीन साल 324 दिन महाराष्ट्र की सत्ता में रह पाये। 1 फरवरी 1999 को शिवसेना के दूसरे सीएम बने नारायण राणे, केवल 258 दिन सत्ता चला पाये। 28 नवंबर 2019 को उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने, दो साल 214 दिन सत्ता में रहे। पुत्र आदित्य ठाकरे को भी कैबिनेट मंत्री बनाया। अपने पूरे कार्यकाल में पिता-पुत्र शालीन दिखते रहे। उद्धव ने अडानी-अंबानी के किसी प्रोजेक्ट को रूकने नहीं दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री आवास से महाभिनिष्क्रमण शालीनतापूर्वक किया, सामान समेटा और ‘मातोश्री’ पहुंच गए। मगर, मुख्यमंत्री पद के लिए हामी भरना क्या उद्धव ठाकरे की पहली ग़लती नहीं थी?

बाला साहेब ठाकरे के रहते दो-दो मुख्यमंत्री शिवसेना के बनाये गये थे, उन्होंने स्वयं इस पद को क्यों नहीं स्वीकार किया था? बाला साहेब ठाकरे ने उम्र के आखिरी पड़ाव में उद्धव ठाकरे को उत्तराधिकार सौंपा, मगर सीएम की कुर्सी के क़रीब नहीं जाने दिया था। सीएम पद अस्वीकार करते रहने से मातोश्री के इकबाल में कोई कमी नहीं आई, बल्कि महाराष्ट्र में उन्होंने समानांतर सत्ता केंद्र बनाये रखा। 17 नवंबर 2012 को बाला साहेब ठाकरे 86 साल की उम्र में गुज़र गये। क्या उसके बाद से वो मूल्य टूटे, जो बाला साहेब ठाकरे निर्मित कर गये थे?

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एक बात तो माननी होगी कि उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसा आक्रामक चाहकर भी नहीं बन सकते। 19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे ने शिव सेना की स्थापना की थी। गठबंधन की राजनीति आरंभ से शिवसेना को भाती रही। मोहभंग भी होता रहा। बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) का चुनाव लड़ना था, मधु दंडवते की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से (पीएसपी) से 1968 में समझौता किया। शिवसेना को 42 सीटें आईं और 11 सीटें पीएसपी को। दोनो पार्टियों में साझेदारी अधिक दिनों तक चली नहीं। ठाकरे ने अपने अखबार मार्मिक में पीएसपी की आलोचना की, और गठबंधन टूट गया। 1970 आते-आते बाला साहेब ठाकरे को लगा, कि कुछ ताक़तवर लोग शिवसेना को बैन करवा सकते हैं। उन्होंने विकल्प के रूप में ‘आज़ाद हिंद पार्टी‘ की स्थापना कर ली। 11 साल 78 दिन सीएम रहे वसंतराव नाइक से बगलगीर हुए। लोग मज़ाक में शिवसेना को ‘वसंतसेना‘ बोलते थे।

31 अगस्त 1975 को साप्ताहिक कार्टून पत्रिका मार्मिक में बाल साहेब ठाकरे ने आपातकाल को समर्थन देते हुए लिखा, ‘ इंदिरा जी को इमरजेंसी इसलिए लगानी पड़ी, क्योंकि अशांति पर काबू करने के वास्ते यही एकमात्र विकल्प रह गया था।‘ इस बहुचर्चित संपादकीय के बाद कांग्रेस से शिवसेना के संबंध और गहरे हुए। लेकिन ए.आर. अंतुले के मुख्यमंत्री रहते शिवसेना और कांग्रेस के बीच खटपट बढ़ने लगी। वह मुंबई मिल वर्कर्स की हड़ताल का समय था। 12 अप्रैल 1982 को मार्मिक साप्ताहिक में बाल साहेब ठाकरे ने एक संपादकीय लिखा, जिसमें कांग्रेस की कामगार नीतियों की भर्त्सना की। पवार उस बीच अपना पेच फिट कर चुके थे। 27 अक्टूबर 1982 को जार्ज फर्नाडिस, शरद पवार और बाल ठाकरे ने कांग्रेस के विरूद्ध शिवाजी पार्क में ‘फ्रेंडशिप रैली‘ की।

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थोड़ा इससे कुछ साल पहले की घटना भी याद दिला दें, जब बाला साहेब ने मार्च 1979 में मुस्लिम लीग के नेता जीएम बनातवाला से कुछ महीनों के लिए गठजोड़ किया था। मतलब, बाला साहेब ठाकरे अपने इस्तेमाल किये जाने का अवसर देते, उसकी क़ीमत वसूल करते। फिर, ‘हम आपके हैं कौन?‘ यह सब करते-कराते शिवसेना, मराठा अस्मिता की ब्रांड अबेसडर बन चुकी थी। बाद में दूसरा ब्रांड अपनाया हिंदूत्व का। 29 नवंबर 1987 को बाल साहेब ठाकरे ने मार्मिक में घोषणा की कि शिवसेना आज से हिंदुत्व की राजनीति करेगी।

एक और सवाल, जो ज़ेरे बहस से छूटता दिखता है, वो ये कि शिवसेना के शब्दभेदी वाण कहाँ से निकलते थे? बाला साहेब ठाकरे का प्रसिद्ध जुमला था-‘खींचों न कमान, न तलवार निकालो/जब तोप मुक़ाबिल हो, तो अख़बार निकालो।‘ कार्टून चुनावी रणनीति बदल सकते हैं, स्लोगन सत्ता की सूरत बदल सकते हैं, उसे बाला साहेब ठाकरे ने एक बार नहीं, कई बार करके दिखाया था। महाराष्ट्र के बहुतेरे लोग ‘उठाओ लुंगी-बजाओ पुंगी‘, ‘कालचा मद्रासी, थोड़ेयाच दिवसात तूपासी‘ (काला मद्रासी कुछ दिनों बाद घी चुपड़ कर खायेगा) जैसे रंगभेदी नारे का इंतज़ार करते। 1966 में पिंपरी पेनसिलिन फैक्टरी में कामगारों की लिस्ट निकाली, और उसे मार्मिक के कार्टून में उकेरा, ‘ये देखो कितने ‘यांडू-गुंडू‘ काम करते हैं।‘ कार्टून पत्रिका मार्मिक अब भी प्रकाशन में है, और 23 जनवरी 1989 से प्रकाशित मराठी दैनिक सामना को देखकर लगता है, जैसे शिवसेना का यह अभेद वैचारिक क़िला हो। क्या इसे भी भेदने की तैयारी चल रही है?

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शिवसेना ने अपनी स्थापना के साल भर बाद से ही विद्रोह देखना शुरू कर दिया था। 1967 में मलाड के यूनिट चीफ बलवंत मंत्री ने बाल ठाकरे के विरूद्ध दादर में रैली निकाली और उनके अलोकतांत्रिक तरीक़े पर सवाल किये। उन दिनों मनोहर जोशी का बाला साहेब के राइट हैंड थे। उसी जगह अपने शिवसैनिकों को लेकर गये, बलवंत मंत्री के कपड़े फाड़ डाले और उन्हें मारते-पीटते मातोश्री ले आये। 24 साल बाद 1991 में बाल ठाकरे के विरूद्ध छगन भुजबल ने विद्रोह का साहस किया। छगन भुजबल ने कई विधायकों और कार्यकर्ताओं के साथ शिवसेना छोड़ दी थी. 2005 में नारायण राणे ने पार्टी छोड़ दी और शिवसेना के कुछ विधायकों को अपने साथ ले गए थे। उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे ने 9 मार्च 2006 को शिवसेना के कई विधायकों, कार्यकर्ताओं के साथ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाया। एक बात तो मानकर चलिये, छगन भुजबल से लेकर राज ठाकरे तक के संबंध विच्छेद शिवसेना के लिए छोटे-मोटे भूस्खलन जैसे थे। मगर, इस बार भूचाल आया है, जिसने दादर स्थित शिवसेना भवन की चूलें हिला दी हैं।

गुरूवार शाम से ही सोशल मीडिया और टीवी पर बहुतेरे लोग देवेन्द्र फडनवीस की ‘उदासी‘ को लेकर परेशान हैं। जो लोग महाराष्ट्र में सत्ताहरण के सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं, वो अब भी डेप्युटी स्पीकर, 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, दल-बदल क़ानून जैसे किंतु-परंतु को लेकर प्रस्तुत हो रहे हैं। उन्हीं सज्जनों से विनम्रतापूर्वक छोटा सा सवाल है, कि जो इस पूरी रणनीति का रचनाकार है, उसे क्या इन तमाम बाधा दौड़ से निकलना नहीं आता?

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