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राजनीति

रेल मंत्री के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

आदरणीय रेल मंत्री जी,
जय श्री राम। उम्मीद है आप अच्छे होंगे। अच्छे ही होंगे, मंत्री लोग अच्छे ही होते हैं।
सर, मैंने अखबार में पढ़ा है कि आपने सीनियर सिटीजन को मिलने वाली रेल रियायत सदा के लिए बंद कर दी है। कोरोना के नाम पर बंद उस सुविधा का लिटमस टेस्ट करके आपने देख लिया था कि कोई चूं नहीं कर रहा, तो आपने पर्मानेंट ताला मार दिया।
सर, मुझे आपसे ये पूछना है कि मेरे साथ अक्सर ऐसा क्यों होता है कि जब मेरी बारी आती है तो लड्डू खत्म हो जाते हैं? मैं न जाने कितने सालों से सीनियर सिटीजन होने का इंतज़ार कर रहा था, सिर्फ इसलिए ताकि मुझे रेल गाड़ी में चलने पर टिकट में छूट कुछ मिल सके। मैंने सचमुच बहुत शिद्दत से इंतज़ार किया है साठ का होने के लिए। अभी मेरे साठ का होने में कुछ साल बचे थे तभी आपने एनाउंस कर दिया कि अब लड्डू खत्म।
सर, मुझसे क्या दुश्मनी है? सबने इतने मज़े लिए आधे दाम के टिकट के, पर संजय सिन्हा की बारी आने से पहले ही सुविधा खत्म?
सर, मेरे मन में बचपन से ये डर रहा है कि सरकार मेरे खिलाफ है। जब इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री थीं और संजय गांधी सुपर प्रधान मंत्री, तब उन्होंने बच्चा पैदा करने पर रोकने वाला कोई आपरेशन कार्यक्रम शुरू कर दिया था। मुझे नहीं पता कि लोगों के बच्चे पैदा करने से उन्हें क्या समस्या थी? इंदिरा गांधी के बच्चे हो ही चुके थे, संजय गांधी खुद शादी कर ही चुके थे, ऐसे में मेरे बड़े होने से पहले ही रोक? सर, मेरे बाल मन में ये डर बैठ गया था कि मेरे जवान होने से पहले सरकार शादी पर ही कही रोक का फरमान जारी न कर दे। मैंने तो अपनी मां से स्कूल के दिनों में ही मेरी शादी करने का अनुरोध कर दिया था। इतना ही नहीं, मैं अपनी समझदारी से दीदी की सहेली के पास शादी का प्रस्ताव लेकर भी चला गया था। मैंने दीदी की सहेली से कहा था कि दीदी आप मुझसे शादी कर लीजिए। सरकार ने अगर शादी का सिस्टम बंद कर दिया तो हम दोनों ऐसे ही रह जाएंगे।
सर, दीदी की सहेली ने मेरे प्रस्ताव पर विचार नहीं किया था, लेकिन यकीन कीजिए जिस दिन मैं बालिग हुआ था, मैंने अपने लिए लड़की ढूंढ ली थी और फटाफट शादी भी कर ली थी। मुझे सरकारी फैसलों से बहुत डर लगता है सर।
सर, वो तो हो गया। लेकिन जब से सरकार ने सीनियर सिटीजन को रेल यात्रा में छूट की घोषणा की थी, मेरे मन में था कि मैं जल्दी साठ का हो जाऊं। मेरे मन में तो ये भी कई बार आया था कि मैं बिहार, यूपी में कहीं सर्टिफिकेट ही बनवा लूं कि मैं साठ का हो गया। पर वो हो नहीं पाया। हालांकि ईश्वर की असीम अनुकम्पा से मेरी उम्र सर्टिफिकेट में कुछ बढ़ा कर ही लिखी गई है, क्योंकि सर्टिफिकेट में मेरी और दीदी की उम्र एक ही है। मैंने बचपन में ऐलान कर दिया था कि स्कूल तभी जाऊंगा जब क्लास में दीदी के साथ बैठने को मिलेगा। मास्टर साहब ने ही रास्ता ढूंढा था और चौथी कक्षा में पढ़ने के लिए जिस उम्र की ज़रूरत थी, उन्होंने रजिस्टर में चढ़ा दिया था। बिहार, यूपी के स्कूलों में ये सब हो जाता है। मैं उस बढ़ी हुई उम्र पर खुश था। मन में था कि जिस दिन साठ का हुआ और रेल यात्रा में सरकारी लाभ शुरू। पर सर, पता नहीं आपको किसने बता दिया कि संजय सिन्हा रेल की रियायती सुविधा लेने वाले हैं और आपने पता नहीं किसके कान भरने पर उसे बंद कर दिया।
सर, सौ-सौ साल के पूर्व के पूर्व सांसद फ्री में ट्रेन में चलेंगे, पर संजय सिन्हा हाफ टिकट पर नहीं चल पाएंगे? इतना भेदभाव क्यों सर? मैं भी इस देश का नागरिक हूं। मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों?
सर, इस देश में सत्तर वाले सर्टिफिकेट में पैंतालीस के बन कर नौकरी पर नौकरी किए जा रहे हैं, यहां पचपन वाला साठ का होने को तैयार बैठा है, तो उसके हिस्से से एक छोटी-सी खुशी भी छीन ली गई, क्यों?
सर, अब तो मुझे ये भी डर है कि जिस दिन मैं सीनियर सिटीजन बनूंगा वित्त मंत्री जी कहीं बैंक वाले को ये निर्देश न दे दें कि सीनियर वालों को मिलने वाला आधा परसेंट अधिक ब्याज भी उनसे छीन लो। सर, मैं क्या करूं? मैंने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है? मैं तो तमाम पोल खोल पत्रकारों (रवीश कुमार, पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार शर्मा, अजीत अंजुम, नवीन कुमार, साक्षी जोशी और अब श्याम मीरा सिंह) की तरह खुलेआम किसी की खिंचाई भी नहीं करता। मैं तो डर-डर कर कभी-कभी कुछ थोड़ा-सा लिखता भी हूं तो मेरे परिवार वाले ही ट्रोलर बन कर मुझ पर चढ़ जाते हैं।
सर, मैं एक अच्छा आदमी हूं। आप लोगों का हितैषी हूं। आप मुझसे मेरी ये सीनियर सिटीजन वाली छोटी-छोटी सुविधाएं न छीनें सर।
सर, बचपन में एक ज्योतिष ने मां से ये कहा था कि मां का संजू बेटा बड़ा होकर सर्वोच्च पद पर जाएगा। लेकिन आप लोगों ने जैसी रणनीति बना ली है, उस हिसाब से कोई सिन्हा, सिंह, शर्मा, पांडे, शुक्ला, चतुर्वेदी, त्रिवेदी या ऐसे ही कोई सरनेम वाले लोग शायद ही कभी सर्वोच्च पद पर पहुंच पाएं। छोड़िए उसकी बात। लेकिन सर, आप प्लीज कुछ कीजिए। इतने वर्षों से चली आ रही सुविधा मेरी बारी आने से पहले खत्म करने के फैसले पर पुनर्विचार करें सर। हमारे बॉस शंभूनाथ शुक्ल सीनियर सिटीजन वाली सारी सुविधा पहले ही उठा चुके हैं, अब हमारी बारी आने का समय आने वाला हुआ तो सब लड्डू खत्म?
सर, या तो आप फ्री के सारे पास बंद करें, या फिर कुछ साल में साठ के होने वाले संजय सिन्हा के लिए हाफ टिकट सिस्टम चालू करें। ये गलत बात है, जब मेरी बारी आती है, मैच ड्रा हो जाता है।
सर, प्लीज़ मेरा दर्द समझिए। मैंने ज़िंदगी भर पत्रकारिता की है। मुझे पेंशन भी नहीं मिलने वाली। मेरी उम्र के जो लोग सरकारी नौकरी में गए थे, उन्हें हर महीने की पेंशन मिलेगी है, उनका काम चल जाएगा, लेकिन मेरा कैसे चलेगा? क्या मैं यात्रा करना छोड़ दूं?
सर, मेरे पत्र पर ध्यान दीजिएगा। सर, मुझे हाफ टिकट पर देश घूमना है। प्लीज़ सर कुछ कीजिएगा। आप तो चुनाव लड़ेंगे नहीं, लेकिन सर मैं वचन देता हूं कि मेरा वोट आपकी ही पार्टी को जाएगा, अगर आपने मेरी फरियाद सुन ली तो।
सर, एक बार फिर आपको जय श्री राम।

उम्मीद से आपका,
संजय सिन्हा
(एक सताया हुआ पत्रकार)

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