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गॉधी जी का आख़िरी अनशन

आर के जैन

15 अगस्त 1947 को एक लंबी लड़ाई के बाद देश आज़ाद हो चुका था। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अब सरकार चला रहे थे। देश के विभाजन के उपरांत भारत और पाकिस्तान दोनों जगह भयानक दंगे हुऐ थे जिसमे हज़ारों लोग मारे गये थे। दोनों तरफ़ के लाखों लोग अपने घर से बेघर होकर शरणार्थी बन चुके थे। दिल्ली में उस समय लाखों की संख्या में शरणार्थी पहुँच चुके थे जो रिलीफ़ कैपो में बसेरा बनाये हुऐ थे। दिल्ली में उस समय मुस्लिमों के प्रति बेहद नफ़रत जनमानस यहॉ तक की पुलिस के दिलों में भी धर कर गई थी । दिल्ली की कई मस्जिदों में शरणार्थियों ने डेरा जमा लिया था और कई जगहों पर ज़बरदस्ती मुस्लिमों के घरो पर भी शरणार्थियों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। दिल्ली उस समय सेना के हवाले थी । मुस्लिमों के प्रति नफ़रत कम होने का नाम ही ले रही थी और चारों तरफ़ नफ़रत, भय व प्रतिशोध की भावना थी ।

 

आज़ाद भारत में बापू ने जिस उद्देश्य और जिन लोगों के लिए आख़िरी अनशन किया था, लगता है उनमें से कुछ लोगों के लिए वह उद्देश्य भी गॉधीजी के साथ ही ख़त्म हो गया। भूलना नहीं चाहिए कि गॉधीजी के विचार और उनके सिद्धांत कभी ख़त्म नहीं हो सकते और गॉधीजी के बताये रास्ते पर चल कर ही कोई समाज, देश या संगठन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । हिंसा, तोड़फोड़, बलवा और अशांति का रास्ता सिर्फ़ बर्बादी का रास्ता है ।

 

गॉधी जी यह सब देखकर अत्यंत व्यथित थे। दिसंबर आ चुका था , दिल्ली शांत हो चली थी पर माहौल तनाव पूर्ण था। उन्हें लगने लगा था कि उनकी उपेक्षा हो रही है और उनकी अब जरूरत नहीं रह गई है । शरणार्थी दाने दाने को तरस रहे थे तो वही मन्त्री गण शाही भोज दे रहे थे तथा देश में एक नया धनाढ्य वर्ग तेज़ी से उभर रहा था । गॉधी जी चाहते थे कि जो भी नीतियाँ बनाई जाये वह ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर बनाई जाये। यद्यपि बड़े नेता दिन में एक बार गॉधीजी के पास ज़रूर आते थे पर वह सरकार की प्राथमिकताओं से संतुष्ट नहीं थे ।

हिंदूओ और मुस्लिमों में बढ़ती दरारों ने उन्हें बैचेन कर रखा था और गॉधी जी का सपना था कि आज़ाद भारत में नफ़रत और वैमनस्य का कोई स्थान नहीं है और सभी को भाई चारे के साथ रहना चाहिये, ताकि सच्चे अर्थों में स्वराज की स्थापना हो सके।

इसी बीच एक मामला पाकिस्तान को उसके हिस्से का बकाया 55 करोड़ रूपये देने का भी था जो भारत सरकार नहीं देना चाहती थी क्योंकि उसने कश्मीर में युद्ध छेड़ रखा था । गॉधी जी चाहते थे कि जिन मुस्लिमों के घरो व धार्मिक स्थलों पर शरणार्थियों ने क़ब्ज़ा कर लिया है वह ख़ाली कराया जाये व पाकिस्तान को उसका बकाया धन दिया जाये ।गाँधी जी की इन माँगों पर सरकार मे ही मतभेद थे। सरदार पटेल ने गॉधी जी जब यह कहा कि ‘ बापू आप यह कैसी बात कर रहे हो ‘ तो गॉधी जी ने शांत स्वर में कहा ‘ तुम वह सरदार नहीं हो, जिसे मैं जानता था ।

 

 

दिनांक 13 जनवरी 1948 से गॉधी जी ने अनशन प्रारंभ किया । कुछ लोग गॉधीजी के इस अनशन से बेहद नाराज़ थे पर पूरे देश में गॉधीजी के अनशन से खलबली मच गई । जगह जगह शांति समितियाँ बन गई जिसमें जनसमूह ‘ हिंदू मुस्लिम भाई भाई, हिंदू मुस्लिम एक है, गॉधी जी की जान बचाओ जैसे नारे तख़्तियाँ लिखकर जुलूस निकाल रहे थे । लाखों लोगों की भीड अनशन स्थल पर पहुँचने लगी जो यही नारे लगा रहे थे कि हम सब एक है, हम सब मिलजुल कर रहेंगे । दरअसल गॉधी जी जनमानस के दिलों में इस कदर पैठ बना चुके थे कि कोई उनके अहित के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मन्दिरों , मस्जिदों में उनकी सेहत के लिये प्रार्थनाऐ व दुआये माँगी जाने लगी । तमाम संगठनों ने यहॉ तक की आरएसएस और हिंदू महासभा ने भी लिखकर यह आश्वासन दिया कि हम सब आपस में मिल-जुलकर और बिना किसी द्वेष भावना के रहेंगे। शरणार्थियों के संगठनों ने भी ऐसा ही आश्वासन दिया । सरकार हर क़ीमत पर गॉधी जी की जान बचाने पर आमदा थी और जब गॉधी जी को यक़ीन हो गया कि अब देश में शांति व भाईचारे का संकट ख़त्म हो गया है तो उन्होंने दिनांक 18 जनवरी 1948 को अपना अनशन समाप्त कर दिया था ।

गाँधी जी इस अनशन के बाद बहुत कमजोर हो गये थे पर उनके आत्म बल में कोई कमी नहीं आई थी । हालाँकि इस अनशन के बाद गॉधी जी बहुत दिनों तक ज़िंदा न रह सके और दिनांक 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई थी ।

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