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जिंदगी में हर रोज एक सीख है

एन.रघुरामन,मैनेजमेंट गुरु
पुरानी कहावत है कि बुढ़ापे में इंसान फिर बच्चा बन जाता है। इस गुरुवार को मैंने यह अनुभव किया, जब मैं अपने 83 साल के ससुर के साथ चेन्नई में अपने एक रिश्तेदार के हाल ही में हुए निधन के बाद दसवें में जा रहा था। ससुर ने बीते चार सालों से घर से निकलना बंद कर दिया है और बाथरूम में गिरने से वह चलने के लिए छड़ी पर निर्भर हैं। ज्यों ही हम मुंबई एयरपोर्ट के अंदर पहुंचे, उन्होंने इच्छा जताई कि छड़ी मैं पकड़ और खुद बिना सहारे चलने लगे। उनका अटपटा व्यवहार मैं समझ सकता था क्योंकि वे अपने 37 साल लंबे करिअर में एयरपोर्ट सिक्योरिटी हैड रहे और कई बड़े एयरपोर्ट जैसे मुंबई, दिल्ली, लंदन में हीथ्रो पर भी रहे। अंदर से वह नहीं चाहते थे कि युवा अधिकारियों को लगे कि वे अब वह बूढ़े हो चले वे हैं। मैं सर्फ मुस्काया और छड़ी लेकर चलने लगा, वहीं वो मेरे आगे-आगे पेंडुलम जैसे बाएं-दाएं हिलते-डुलते चलने लगे ! उनका झूलना जब भी सीमा के बाहर जाता, तो मेरी आंखें-हाथ हर बार सामंजस्य बैठाते। उन्होंने पहले ही चेता दिया था कि मैं उन पर व्हील चेयर पर बैठने का दबाव नहीं डालूंगा।

जैसा कि अनुमान था, हमारा बोर्डिंग गेट एयरपोर्ट के सुदूर हिस्से में था और मुझे पता था कि वहां तक पैदल पहुंचने में एक घंटा लगेगा। मैंने एयरपोर्ट मैनेजर से आग्रह किया कि वह बैटरी कार से हमें वहां पहुंचा दें क्योंकि मैं इतना लंबा नहीं चल सकता। वह सच में यह कहते हुए कार में बैठे कि ‘तुम लोग बहुत ज्यादा आरामतलब हो गए हो।’ एयरपोर्ट मैनेजर और मैं बस मुस्कुरा दिए और कोई तर्क नहीं किया।

• विमान के अंदर पहुंचते ही उन्होंने जोर दिया कि वो खिड़की तरफ नहीं बल्कि गलियारे वाली सीट पर बैठेंगे, जो कि सामान्य था क्योंकि सारे सुरक्षा अधिकारियों की इस वाली सीट पर बैठने की आदत होती है ताकि विमान के अंदर की हर गतिविधि पर नजर रख सकें और आपात के समय तुरंत एक्शन ले सकें। 83 की उम्र में भी उनका जज्बा 30 के जैसा था सिर्फ शरीर साथ नहीं दे रहा था। मैंने एक और कारण से उन्हें ऐसा करने दिया क्योंकि वह हमेशा बिजनेस क्लास से यात्रा करते थे और इस यात्रा के लिए उनकी शर्त थी कि बिजनेस क्लास में यात्रा के लिए दोनों टिकट वही खरीदेंगे। कुछ के लिए दामाद से पैसे लेना प्रतिष्ठा का सवाल होता है। लोगों

विमान के अंदर काहिरा (इजिप्ट) के कुछ बिजनेसमैन चेन्नई जा रहे थे और हमारे बाजू में बैठे थे। नाश्ता परोसा गया और पिछले कुछ सालों से हाथ से खा रहे ससुर ने कांपते हाथों से अचानक कांटे-छुरी से खाना शुरू कर दिया, वो शायद इसलिए क्योंकि वे इजिप्ट के बिजनेसमैन को ये जताना चाह रहे थे कि भारत के बुजुर्ग भी जानते हैं कि अंग्रेजी कटलरी से कैसे खाते हैं। पर इस प्रक्रिया में उन्होंने आधा खाना नीचे गिरा दिया, एक चौथाई शर्ट पर और बाकी पेट में गया। मैंने अपना नाश्ता छोड़ा और चुपचाप उनकी शर्ट, चेहरा और सीट साफ कर दी। वो बिजनेसमैन मुस्कुराते हुए मेरी ये हरकत देख रहे थे। और मैं उनकी मुस्कान पढ़ पा रहा था, वो व्यंग्यात्मक तो हर्गिज नहीं थी।

जब विमान चेन्नई एयरपोर्ट पर रुका, तो वे उठकर मेरी सीट पर आए और हाथ मिलाते हुए बोले ‘मुझे मेरी जिंदगी का एक सबक मिल गया कि पिता के साथ कैसे पेश आते हैं और फिर मेरे ससुर की ओर रुख करते हुए, बिना ये जाने कि मैंने उनकी बेटी के साथ शादी की है, वो ससुर से बोले कि ‘आपका बेटा बहुत अच्छा है।’ मेरे ससुर ने कहा, ‘वह बेटे से बढ़कर है’ और ये कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं।

फंडा यह है कि जिंदगी आपको हर रोज आंखों के सामने घट रही घटनाओं के जरिए सीख देती है, क्या आप विजुअल माध्यमों से मिल रही सीख को शब्दों में पिरोकर दूसरों तक पहुंचाने के लिए तैयार हैं?(साभार दैनिकभास्कर)

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