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विविध

रामलोचनशरण बिहारी और बालक की पत्रकारिता

कहा जाता है कि रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) का हिंदी बाल साहित्य की रचना और प्रकाशन में वही स्थान है जो गुजराती भाषा में आचार्य गिजूभाई को प्राप्त है। यूनेस्को से जो शिक्षा-सम्बंधी सूचना प्रकाशित हुई थी, उसमें चौदह पुस्तकों के बीच आपकी भी एक पुस्तक की चर्चा है। बाल शिक्षा साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘मनोहर पोथी’ आप ही की रचना है। आपने बिहार में पढ़ाई जानेवाली प्रायः सभी कक्षाओं की पुस्तकों का मुद्रण एवं प्रकाशन किया।

‘बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार है’, इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1925 ई. में लहेरियासराय (दरभंगा) से ‘बालक’ सचित्र मासिक का प्रकाशन शुरू किया। आचार्य शिवपूजन सहाय ने निराला को पत्र (16. 2. 28) लिखने के लिए आपने जिस पैड का इस्तेमाल किया है, उस पर ‘बालक’ सचित्र मासिक छपा है।

‘बालक’ के आरंभिक संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे, बाद के दिनों में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। ‘बालक’ के प्रवेशांक को वणिक प्रेस, कलकत्ता में मुद्रित कराया गया। तब वहीं ‘समन्वय’ में बाबू शिवपूजन सहाय कार्यरत थे। इसके आरंभिक दो अंक शिवपूजन सहाय द्वारा ही संपादित होकर उन्हीं की देख-रेख में वणिक प्रेस में छपे थे। शिवजी को लिखे बेनीपुरी के पत्रों से ज्ञात होता है कि संपादन का सारा भार बेनीपुरी जी ने शिवजी पर छोड़ दिया था। यद्यपि पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी का नाम ही छपता रहा। 1925 से 28 तक बेनीपुरी जी बालक के प्रधान संपादक रहे। ‘बालक’ की परिकल्पना में रामवृक्ष बेनीपुरी की बराबर की भागीदारी थी इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’

तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में नाम रामलोचनशरण बिहारी का जाने लगा हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। शांतिप्रिय द्विवेदी ने निराला को पत्र में लिखा कि बेनीपुरी ने ‘बालक’ और लहेरियासराय को छोड़ दिया। अब शिवपूजन जी एकच्छत्र सम्राट हैं। इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। विनोदशंकर व्यास ने निराला को पत्र (15. 7. 27) लिखा, ‘‘शिवजी को अपने कार्य से छुट्टी नहीं मिलती, वह ‘बालक’ में ही व्यस्त रहते हैं।’’ संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में एक प्रेस खोला, जिसका नामकरण ‘विद्यापति प्रेस’ किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण विद्यापति प्रेस, लहेरियासराय में ही होने लगा।

रामलोचनशरण बिहारी के संपादन में ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत हिन्दी-पुस्तक-भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) से 1926 ई. (संवत् 1983 वि.) में ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ था। इसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापति (पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, बाबू शिवनन्दन सहाय, पंडित सकलनारायण पाण्डेय एवं पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र) तथा पांच स्वागताध्यक्षों के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में बालक पत्रिका (वार्षिक मूल्य 3 रुपये, प्रति मास 48 पृष्ठ और 30-32 चित्र) का विज्ञापन (नमूना) छपा था-‘‘आजतक हिन्दी में जितने बालोपयोगी पत्र निकल चुके हैं या निकलते हैं, उनसे इसमें अनेक विशेषताएं हैं। बंगला, मराठी, गुजराती, अंगेजी आदि उन्नत भाषाओं के बालोपयोगी पत्रों के सामने रखने योग्य अभी तक इसके सिवा कोई पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी में नहीं निकला। इसके अन्दर बालकों की ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन के सभी प्रकार के साधन उपस्थित हैं। इसमें 16 स्थायी सचित्र शीर्षक हैं, जिनमें विविध शिक्षाप्रद सामयिक विषयों के समावेश किया गया है, जिनसे प्रति मास बालकों को भिन्न-भिन्न भांति की लाभदायक बातें मालूम हो जाती हैं। छपाई, सफाई, शुद्धता और सुन्दरता तथा भाषा की सरलता और विषयों के चुनाव पर इतना काफी ध्यान दिया जाता है कि इसका नियमित रूप से पढ़नेवाला बालक थोड़े ही दिनों में विविध उपयोगी ज्ञानों का भण्डार बन जायगा। ‘विज्ञान’, ‘बहादुरी की बातें’, ‘केसर की क्यारी’, ‘जीवजन्तु’, ‘इतिहास’, ‘अनोखी दुनिया’, ‘वह कौन है?’, ‘बुढ़िया की कहानी’, ‘पँचमेल मिठाई’, ‘पूछताछ’, ‘भला-चंगा’, ‘हँसी-खुसी’, ‘कहाँ और क्या’, ‘बालक की बैठक’, ‘बालचर’ और ‘संपादक की झोली’-इन 16 स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चौथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चौदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। उक्त सभी विषयों के समावेश के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि ऐसी एक बात भी न हो जिससे बालकों का वास्तविक हित न हो। यही कारण है कि सभी पत्रों और विद्वानों ने मुक्त कंठ से इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यदि आप अपने बालकों का सच्चा कल्याण चाहते हैं, उनके जीवन को मंगल और आनन्द से भरपूर बनाना चाहते हैं, तो इस ‘बालक’ द्वारा उनके ज्ञान का खजाना भरिये।’’

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं: ‘आयरलैंड के प्रसिद्ध नेता डी. वेलरा का स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रखी जाय और दूसरी ओर मातृभाषा, तो मैं मातृभाषा को लूँगा क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूँगा।’

हिन्दी का कोई भी छोटा-बड़ा ऐसा लेखक नहीं था जिसकी रचनाएँ बालक में न छपती थीं। दिनकर, प्रभात, आरसी, हंसकुमार तिवारी, नेपाली आदि की काव्य-प्रतिभा बालक के पृष्ठों में ही पल्लवित हुई। राष्ट्रीय स्तर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी हिन्दी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोपाल सिंह नेपाली की पहली कविता रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में ही ‘बालक’ पत्रिका में छपी थी। शीर्षक की पंक्ति थी ‘भारत गगन के जगमग सितारे’। यह संभवतः 1926-27 की बात थी, और उस समय नेपाली तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे-उम्र कोई 15-16 वर्ष रही होगी। सुरेश सलिल के अनुसार गोपाल सिंह नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी बतायी जाती है जो सही नहीं है।

‘बालक’ ने स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बाल सामग्री की प्रस्तुति में एक प्रतिमान उपस्थित किया। सन् 1969 ई. में ‘बालक’ की प्रसार संख्या 22,000 थी। किसी भी साप्ताहिक या मासिक में सबसे ज्यादा इसी की बिक्री थी। इससे बिहार में सुरुचिपूर्ण बाल पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। इन्होंने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले लुभावने एवं आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इनका महत्तम योगदान यह है कि इनसे बच्चों में साहित्यिक रुचि का विकास हुआ, उनकी भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ तथा उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की आशातीत वृद्धि हुई।

स्वतंत्रता से पहले रामलोचनशरण बिहारी अंग्रेजी राज के प्रति तनिक उदार बने रहे। मई, 1935 में जब सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती मनाई गई थी, रामलोचनशरण बिहारी ने न केवल बहुत उत्साह के साथ उसमें योग दिया था बल्कि ‘बालक’ का रजत जयन्ती अंक बहुत सुन्दर निकाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी साज-सज्जा में यह जनवरी, 1935 के अपने ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव में भी आपने उसी उत्साह से सेवा की थी। उस अवसर पर भी बालक के द्वारा आपने राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया था। सम्राट पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी आपका शोक-प्रकाश बालक के विशेषांक में प्रकट हुआ था। सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘कॉरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ

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