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SC की याचिका का कोई मतलब नहीं, हमारा जाति सर्वेक्षण है जनगणना नहीं: नीतीश कुमार 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘जाति जनगणना’ कराने के लिए बिहार सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमत होने के कुछ घंटों बाद, बिहार में सत्तारूढ़ जद (यू) ने बुधवार को आरोप लगाया कि उसकी पूर्व सहयोगी भाजपा सुप्रीम कोर्ट के बहाने अप्रत्यक्ष रूप से ‘जाति सर्वेक्षण’ रोकने पर अड़ी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट बुधवार को नालंदा जिले के एक अखिलेश कुमार की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया, जिसमें कहा गया है कि ‘जाति जनगणना’ केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की खंडपीठ ने कहा, “मामले को अगले शुक्रवार को आने दें।”

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि राज्य की अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है जो कानून के समक्ष समानता और कानून के तहत समान सुरक्षा प्रदान करता है, यह कहते हुए कि अधिसूचना “अवैध, मनमानी, तर्कहीन और असंवैधानिक” थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया, “यदि जाति-आधारित सर्वेक्षण का घोषित उद्देश्य जाति उत्पीड़न से पीड़ित राज्य के लोगों को समायोजित करना है, तो जाति और मूल देश के आधार पर भेद तर्कहीन और अनुचित है। इनमें से कोई भी भेद कानून के स्पष्ट उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।”

सीएम नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि यह उनकी समझ से परे है कि लोग जाति सर्वेक्षण के खिलाफ याचिका क्यों दायर कर रहे हैं। नीतीश ने बुधवार को मधुबनी में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि, “जाति सर्वेक्षण सभी लोगों, समाज के सभी वर्गों के हित में है। हम सभी लोगों की आर्थिक स्थिति से संबंधित डेटा एकत्र कर रहे हैं, चाहे वे किसी भी जाति के हों…। ऊंची जातियों के लोगों को भी इसका लाभ मिलता है। हम पहले ही उच्च जातियों के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कोटा का समर्थन कर चुके हैं। उनके पास 10% कोटा है।” उन्हों ने कहा, “हम ‘जाति जनगणना’ नहीं कर रहे हैं, हम ‘जाति आधारित सर्वेक्षण’ कर रहे हैं।”

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