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राजनीति

बिहार कांग्रेस में तकरार

बिहार में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच कांग्रेस फिर अंदरूनी संकट से जूझती दिखाई दे रही है। टिकट वितरण को लेकर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और खुले मंच से नेतृत्व पर सवाल उठाना सिर्फ असंतोष का मामला नहीं, बल्कि यह उस गहरे संकट का संकेत है जिससे कांग्रेस वर्षों से गुजर रही है। संगठनात्मक जवाबदेही की कमी, आंतरिक लोकतंत्र का क्षरण और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव साफ दिख रहा है।

पटना में कई पुराने और अनुभवी कांग्रेस नेताओं ने जिस प्रकार से मीडिया के समक्ष अपनी ही पार्टी के प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पर गंभीर आरोप लगाए हैं, वह कांग्रेस के अंदर संघर्ष बनाम सिफारिश की लड़ाई को सामने लाता है।

 

पटना में कांग्रेस रिसर्च सेल के अध्यक्ष आनंद माधव, पूर्व प्रत्याशी गजानंद शाही, छत्रपति तिवारी, नागेंद्र प्रसाद विकल, रंजन सिंह, बच्चू प्रसाद सिंह और बंटी चौधरी समेत कई नेताओं ने बगावत का बिगुल फूंक दिया। इन नेताओं ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि बिहार कांग्रेस अब “कुछ नेताओं के निजी दलालों” के हाथों में कैद हो गई है। आरोप है कि वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर ऐसे चेहरों को टिकट दिया जा रहा है, जो राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हैं और जिनकी पहचान केवल धनबल तक सीमित है।

 

यह सवाल सिर्फ टिकट पाने या न पाने का नहीं है, बल्कि उस मूलभूत सवाल से जुड़ा है कि कांग्रेस बिहार में अपने सांगठनिक ढांचे में विचारधारा और कर्मशीलता को कितना महत्व देती है? जब टिकट वितरण का आधार संगठन में सक्रियता के बजाय व्यक्तिगत समीकरण और आर्थिक हैसियत बन जाए तो कोई भी पार्टी अपनी वैचारिक धुरी खोने लगती है।

 

असंतुष्ट नेताओं ने सीधे तौर पर राहुल गांधी पर तो उंगली नहीं उठाई, लेकिन उनका यह कहना कि “राहुल गांधी के भरोसे का दुरुपयोग हुआ है”, संकेत देता है कि प्रदेश नेतृत्व पर केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ या निगरानी कमजोर रही है। यह कांग्रेस के लिए नई बात नहीं। कई राज्यों में देखा गया है कि राहुल गांधी का नाम लेकर आंतरिक गुटबाजी को या तो सही ठहराया जाता है या उसके पीछे छिपने की कोशिश की जाती है।

 

इससे यह सवाल उठता है कि क्या राहुल की टीम में वे लोग हैं जो जमीनी हकीकत से अवगत हैं? और अगर हैं तो क्या उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया जा रहा है? बिहार में कांग्रेस पहले ही राजनीतिक जमीन खोकर लालू यादव की गोद में बैठी हुई है। अगर टिकट बंटवारे में भी पारदर्शिता नहीं होगी तो पार्टी को फिर से जिंदा करने के प्रयासों को झटका लगना तय है।

 

यह विवाद केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। बिहार में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा है। ऐसे वक्त में जब सीट बंटवारे को लेकर ही घटक दलों के बीच भारी तकरार है तो कांग्रेस के भीतर उपजे असंतोष से गठबंधन की दरार और बढ़ सकती है। अगर नाराज नेता अंदरूनी मंचों की बजाय बाहर आकर बगावती तेवर दिखाते हैं तो यह सिर्फ विरोधियों को ही फायदा नहीं पहुंचाएगा, बल्कि कांग्रेस के अंदर संगठनात्मक विफलता को भी उजागर करेगा।

 

कांग्रेस के पास अभी भी मौका है कि वह इस आंतरिक नाराजगी को आलोचना न मानकर संवाद और सुधार के अवसर के रूप में देखे। अगर यह असंतोष सिर्फ दमन या अनदेखी के जरिए दबाया गया तो चुनाव में न सिर्फ हार होगी, बल्कि समर्पित कार्यकर्ताओं का भरोसा भी खो देगी।

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