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शिक्षा

कौन बड़ा कौन छोटा?

अभयानंद-IPS

बात 2013 की है। मैं राज्य का DGP हुआ था। किसी अत्यंत आवश्यक काम से माननीय उच्च न्यायालय के रेजिस्ट्रार जनरल से मिलने के लिए मुझे उनके ऑफिस जाना पड़ा।मैंने उन्हें फोन मिलाया, समय मांगा और उस समय पर वहाँ पहुँच गया। मेरे साथ मेरे अंगरक्षक भी थे। रेजिस्ट्रार जनरल साहब के कक्ष द्वार पर उनके चपरासी अपनी सफेद लिबास में द्वार पर तैनात थे। उन्होंने मुझे रोका। मेरे अंगरक्षक को यह बहुत नागवार लगा। वे बलपूर्वक दरवाजा खोल कर मेरे अंदर जाने की व्यवस्था करने लगे। मैंने अपने अंगरक्षक को सख्त लहजे में ऐसा करने से मना किया। द्वारपाल को अपना नाम बताया, पदनाम नहीं बताया और अनुरोध भरे लहजे में बताया कि साहब को कृपया सूचित कर दें कि मैं मिलने आया हूँ, मिलने का समय दूरभाष पर निर्धारित है।महाशय तुरंत अंदर गए। मैं अंगरक्षक के साथ द्वार पर उनका इंतजार करता रहा। वो शीघ्र ही लौटे और आदरपूर्वक मुझसे कक्ष में प्रवेश करने का इशारा किया।

प्रयोजन सिद्ध होने के पश्चात्‌, मैं लौटने के लिए जैसे ही गाड़ी पर बैठा, मेरे अंगरक्षक ने सवाल किया – “सर, आपने मुझे चपरासी को आपको रोकने से रोका क्यों? चपरासी की क्या हैसियत कि वह DGP को रोक दे?”वे ख़ासा उत्तेजित थे। मैंने उन्हें शांत भाव से समझाया – “प्रजातांत्रिक परिवेश में न कोई बड़ा है न छोटा।सभी अपनी मर्यादा की सीमा में रहते हैं। सबों की सीमाएं निर्धारित हैं। यह व्यवस्था बहुआयामी है इसलिए न कोई बड़ा है न कोई छोटा।अगर कोई अपनी मर्यादा के दायरे में रहता है तो उससे अधिक शक्तिशाली कोई नहीं। जब कोई ऊँचे पद पर आसीन व्यक्ति अपनी मर्यादा का उल्लंघन करता है तो उस वक्त उससे ज्यादा शक्तिहीन कोई नहीं है।द्वारपाल ने मुझे रोका, वो अपनी मर्यादा के अंदर थे। मैं अगर बलपूर्वक अंदर चला जाता तो मैं अपनी मर्यादा का हनन करता और शक्तिहीन हो जाता।अंगरक्षक ने गंभीर आवाज में कहा – “सर समझ गया।”

(लेखक बिहार के पूर्व DGP हैं)

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