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किस्मत की लकीरें खींची नहीं जाती

नूतन सिंहा
वर्तमान जीवन जीने में ऐसा लगता कब क्या हो जाये ! या कब क्या सुनने को मिल जाये ! प्रत्येक इन्सान को सोचना और समझना बहुत ही आवश्यक है कि सत्य और झुठ में क्या अंतर है जब तक उन्हें सही-गलत की पहचान नहीं होगी वे किसी न किसी प्रकार के जुर्म करते रहेंगे । हम सभी को यह समझना होगा की हम किस पथ की ओर जा रहे हैं, क्योंकि किस्मत की लकीरें खींची जाती नहीं, उसे बनायी जाती है । लोग कहते हैं, जो लिखा होगा, वही होगा । परन्तु ये कभी हमने नहीं सोचा हमारा क्या होगा ? अगर ऐसा सोच ले व्यक्ति तो, भ्रष्टाचार कभी न पारिवारिक होगा और न सामाजिक होगा। जिन्दगी कितनी अनमोल होती है । नौ महिने एक नारी अपने गर्व में रखकर सेजती है वो बच्चा जब दुनिया में आता है तो अपराध के जुर्म में वो मारा जाता है ये हम महिलाओं के लिये बहुत ही सोचनीये और गम्भीर बात है ।

 

 

अभी से ही हमें अपने बच्चों की परवरिश में सतर्कता लानी होगी और यह सोचना होगा कि हमारे बच्चों की संगति एवं झुकाव किस तरह की है । दुनिया वाले उसकी जो दुश्मन बने उससे पूर्व मैं ही क्यों न दुश्मन बन कर उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिशें करुँ । ये कोई जरुरी नहीं की हमारा बच्चा डॉक्टर इंजिनीयर आई पी एस या वगैरह वगैरह ही बने अगर हमारा di rection प्रारम्भ काल से सही रहेगा तो बच्चे गलत रास्ते की ओर बढ़ने के लिये सौ बार सोचेंगे। ये भी कोई जरुरी नहीं खुद गलत रास्ता का कोई चयन कर लेते हैं कभी कभी उन्हें कुछ संगतियां भी उन्हें उस ओर ले जाती हैं , परन्तु व्यक्ति जिस समय गलत करता है उस समय उसे एक जुनून सवार रहता है और उसका झुकाव बढ़ता चला जाता है जिसे रोकने में कठिनाई होती है । कोई माता-पिता कभी नहीं चाहते हैं कि हमारे बच्चे अपराधी बने । पहले तो माता-पिता की ढ़ेर सारी उम्मीदें रहती थीं कि हमारा बच्चा बुढ़ापा का सहारा होगा ।

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