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शिक्षा

बहुत मुश्किल होता है मरने तक जिंदा रहना…।

राजेंद्र सिंह
बड़ा सरल है, दूसरों को दिखाने के लिए चेहरे पे मुस्कान सँजोये रखना। उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है अपने अंदर के जख्मों को निरंतर टाँके लगाके रखना। अपने फूट पड़ते आँसुओं को जब्त किए रहना। उस व्यक्ति के लिए और भी मुश्किल हो जाता है जो स्व को जानता हो, अकेला हो , जिसे समूची मानव जाति की भी चिंता हो। उसका विजन क्लियर हो, दृष्टि साफ हो, अंदर के आइनें से अपनी और समाज दोनों की गंदगी को देख सकने की क्षमता रखता हो। सत्य के मार्ग को अपने अंदर तलाशता हो, दूसरे के मानवीय दुःखों, कष्टों और वेदनाओं से खुद भी व्यथित होता हो। अपने स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान हो और उतना ही वह दूसरों के अस्तित्व और स्वतंत्रता का आदर करता हो। वह सत्य का मार्ग जानता हो (भले ये उसका भ्रम ही सही) लेकिन दूसरों को उस मार्ग पे ले आने में खुद को असहाय महसूस करता हो।

किन्तु फिर भी उसे जीना पड़ता है क्योंकि उसे जिंदगी के अमूल्य होने का एहसास है। इसकी खूबसूरती व इसके इंद्रधनुषी रंगों से वो वाकिफ़ है। उसे अपनी मंजिल का भी पता है जो इसी क्षण है , जो कुछ भी है बस इन्हीं पलों में है। अब इन्ही पलों में जीने के लिए उसे समय को रोकना होता है, मस्तिष्क में चल रही विचारों की आंधी को थामना पड़ता है, मृत्यु को साथ लेके चलना पड़ता है। उसे खुद के प्रति , अपनों के प्रति, समाज के प्रति, मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का बखूबी एहसास है। यही एहसास उसे बताता है कि खुद को जिंदा रखना कितना जरूरी है किसी भी व्यक्ति के लिए !

जिंदगी के इन एहसासातों से ज्यादा साबिक़ा उनका पड़ता है जो समस्त दुखों, कष्टों और वेदनाओं को ईश्वर पे थोप के पलायन नहीं करते, जो इसके निवारण हेतु किसी धार्मिक या आध्यात्मिक गुरुओं की शरण में नहीं जाते। जिन्हें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरिजा के चोचलों पे कत्तई यक़ीन नही है। जो ईश्वर के अस्तित्व को मानने से ही इंकार करते हैं। जो हर वेदनाओं को खुद के बूते खुद के सीने पे 24 सों घंटे झेलते हैं। ऐसे व्यक्ति पारलौकिक जीवन (स्वर्ग-नर्क) , आत्मा और मोक्ष जैसी किसी भी काल्पनिक परिकल्पना को नहीं मानते। उन्हें इहलौकिक जीवन से प्यार है बावजूद इसके कि, वो इसकी निस्सारता को हर वक्त स्पस्ट देख सकते हैं।

अब ऐसे लोग क्या करते हैं कि वो केवल खुश दिखे ही नहीं बल्कि बल्कि अंदर से खुशी को हर पल महसूस भी करते रहें ? ..इस विषय पे आगे किसी दिन चर्चा कर लेंगे अभी मैं आपको गीतकार साहिर की इन पंक्तियों के साथ छोड़े जा रहा हूँ …
आगे भी जाने ना
तू पीछे भी जाने ना तू
जो भी है बस यही एक पल है.

ज़ेबुन्निसा की कविता

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