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केंद्र ने ‘प्रोजेक्ट चीता’ पर वेब सीरीज को मंजूरी दी

नयी दिल्ली: 31 अगस्त (भाषा) अफ्रीका से लाए गए चीतों की बसाहट को लेकर चिंताओं के बीच, केंद्र ने ‘‘प्रोजेक्ट चीता’’ पर चार-भाग की वेब सीरीज के फिल्मांकन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, ताकि ‘‘देश के प्रयासों को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया जा सके।’’ आधिकारिक रिकॉर्ड से यह जानकारी मिली।पता चला है कि फिल्मांकन सितंबर में, संभवतः 17 सितंबर को ‘प्रोजेक्ट चीता’ की दूसरी वर्षगांठ के आसपास शुरू होगा।एनटीसीए के उप महानिरीक्षक वैभव चंद्र माथुर ने 21 जुलाई को मध्यप्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन को लिखे पत्र में कहा कि प्राधिकरण की आठवीं तकनीकी समिति ने चीता को दूसरे महादेश में बसाने की दुनिया की पहली पहल ‘प्रोजेक्ट चीता’ पर एक वेब सीरीज के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।पत्र में कहा गया, ‘‘इस संबंध में, यह अनुरोध किया जाता है कि कृपया मेसर्स शेन फिल्म्स और प्लांटिंग प्रोडक्शंस को मानक नियमों और शर्तों के अनुसार कूनो राष्ट्रीय उद्यान और गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में फिल्मांकन करने की सुविधा प्रदान की जाए, ताकि देश के प्रयासों को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया जा सके।’’राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन ने छह अगस्त को प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

 

 

प्रस्ताव के अनुसार, वेब सीरीज को डिस्कवरी नेटवर्क पर 170 देशों में विभिन्न भाषाओं में प्रसारित किया जाएगा।वेब सीरीज का उद्देश्य परियोजना की संकल्पना, चीतों को भारत लाने में आई कठिनाइयों, चीतों की स्थिति और भविष्य की अपेक्षाओं को उजागर करना है। प्रस्ताव में कहा गया है कि इसका लक्ष्य लोगों को ‘‘इस विशाल परियोजना की बारीकियों को समझाना’’ है।पूर्व में एनटीसीए और भारतीय वन्यजीव संस्थान के साथ तालमेल कर चुके वेब सीरीज बनाने वालों ने परियोजना के क्रियान्वयन के लिए 50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता को लेकर मध्य प्रदेश पर्यटन और ‘एमपी टाइगर फाउंडेशन’ से भी संपर्क किया है।एक अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं करने का अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘वित्तीय सहायता संभव नहीं है, लेकिन हम निर्देशानुसार वेब सीरीज के फिल्मांकन के लिए पूरा सहयोग देंगे।’’भोपाल स्थित वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने ‘‘वृत्तचित्र’’ बनाने की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस परियोजना के सामने ‘‘कई चुनौतियां हैं, जिनका पहले समाधान किया जाना चाहिए।’’

 

 

 

उन्होंने वेब सीरीज को फिल्माने की अनुमति देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया और कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि चीता परियोजना संचालन समिति ने ‘‘इस मुद्दे पर कभी चर्चा नहीं की।’’ इस समिति का गठन पिछले साल मई में परियोजना की प्रगति की निगरानी और समीक्षा करने तथा इसके क्रियान्वयन पर मध्यप्रदेश वन विभाग और एनटीसीए को सलाह देने के लिए किया गया था।अब तक अफ्रीका से 20 चीते भारत लाए जा चुके हैं। सितंबर 2022 में नामीबिया से आठ और फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए।कुछ चीतों को शुरू में जंगल में छोड़ दिया गया था, लेकिन पिछले साल 13 अगस्त तक तीन चीतों की सेप्टीसीमिया से मौत हो जाने के बाद उन्हें वापस बाड़ों में भेज दिया गया था।खुले में घूमने वाला एकमात्र चीता पवन मंगलवार को मृत पाया गया। अधिकारियों ने उसकी मौत का प्राथमिक कारण डूबने को बताया।पिछले सप्ताह एक बैठक में, संचालन समिति ने देश के मध्य क्षेत्रों से मानसून की वापसी के बाद, जो आमतौर पर अक्टूबर के पहले सप्ताह तक होता है, चीतों और उनके शावकों को चरणबद्ध तरीके से जंगल में छोड़ने का फैसला किया।

इस परियोजना की शुरुआत में चीतों की मौत के कारण आलोचना हुई थी। हालांकि, इस साल 12 शावकों के जन्म के बाद, अधिकारियों का कहना है कि परियोजना सही दिशा में आगे बढ़ रही है।भारत आने के बाद से तीन मादा और पांच नर समेत आठ वयस्क चीते मर चुके हैं। भारत में 17 शावकों का जन्म हुआ है, जिनमें से 12 जीवित हैं।अधिकारियों के अनुसार, भारत ने वर्ष के अंत तक चीतों का एक नया जत्था लाने के प्रयासों में भी तेजी ला दी है, तथा जमीनी स्तर पर बातचीत के लिए एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही दक्षिण अफ्रीका का दौरा करेगा। ‘पीटीआई-भाषा’ को पता चला है कि केन्या के साथ भी बातचीत चल रही है, तथा एक समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप दिया जा रहा है।‘भारत में चीता को बसाने के लिए कार्य योजना’ में दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया और अन्य अफ्रीकी देशों से पांच वर्षों के लिए प्रति वर्ष लगभग 12-14 चीते लाने की बात कही गई है। चीतों का अगला जत्था गांधी सागर लाया जाएगा, जिसे दूसरे स्थान के रूप में चुना गया है, क्योंकि कूनो में पहले ही 20 चीतों को रखने की क्षमता पार हो चुकी है।

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