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वेतनभोगियों और पेंशनधारियों की हक़मारी पर छलका जदयू नेत्री का दर्द,उठाये कई सवाल

सुहेली मेहता ने कहा:नए संसद भवन का निर्माण होना है, जिसपर प्राथमिक तौर पर 12450 करोड़ रुपये का खर्च होना है | मेरा कहना है कि आर्थिक संकट नहीं था तब कोई बात नहीं थी..और भी ख़ूबसूरत बिल्डिंग का निर्माण हो जाए, क्या दिक्कत है… लेकिन संकटकाल में जिस देश के अन्नदाता, मजदूर भूखमरी के कगार पर हों, वहाँ इतने खुबसूरत संसद भवन को तोड़कर दूसरा फाइव स्टार वाली सुविधा वाले भवन का निर्माण उस देश केलिए विलासिता ही होगी | केंद्र सरकार को पहले इस प्रोजेक्ट को कैंसिल कर किसान, मजदूर और कमजोरों की आवश्यक-आवश्यकता की पूर्ति इस बुरे वक़्त में करनी चाहिए |

पटना:कोरोना की लड़ाई के नाम पर केंद्रीय कर्मियों के वेतन-भत्तों में भारी कटौती करने के केंद्र सरकार के फैसले का विरोध बढ़ता जा रहा है। इसी कड़ी में बिहार में भाजपा नीत जदयू की नेत्री और महासचिव सुहेली मेहता ने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट फेसबुक के द्वारा अपनी पीड़ा व्यक्त की है।हालांकि उन्होंने इस पोस्ट और बयान को राजनीतिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत बताया है लेकिन जिस तरह से उन्होंने तर्कसंगत सवाल उठाए है वो यक़ीनन बहुत कुछ कहते हैं।सुहेली मेहता ने लिखा कि हम सब अभी कोरोना संकट के दौर से गुजर रहे हैं| उम्मीद है कि आप सब अपने-अपने घरों में सुरक्षित होंगे | परेशानी तो है.. मुझे, आपको और हम-सबको | हम सब सरकार और प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन कर अपने आपको सुरक्षित रखने में लगे हैं | केंद्र की सरकार और राज्य की सरकारें भी केंद्र सरकार के दिशा निर्देशों के साथ साथ अपने-अपने प्रयासों से भी अपने देश और राज्य की जनता को सुरक्षित रखने में लगी पड़ी है |इसमें कोई शक नहीं कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पूरी दुनिया की नजरों में हमारे देश के गौरव को बढाया है और हमें अपने प्रधानमन्त्री जी पर गर्व भी है क्योंकि उनमें कुछ भी कर गुजरने की क्षमता है | आज कोरोना संकट से जूझ रहे हमारे देश की जनता को सुरक्षित रखने केलिए कई कोशिशें भी उनके द्वारा की गई है | लेकिन लगता है कि अब देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है | तभी तो देश के लगभग सवा करोड़ सरकारी कर्मियों के महंगाई भत्ता तक को रोकने की जरुरत आन पड़ी..यहाँ तक कि सेना के जवान, जिनके चलते हम अपने घरों में सुरक्षित रहते हैं उनके पेंशन से 11,000 करोड़ रुपये भी भारत सरकार को काटने पड़ गए ।लगा कि चलो कोई नहीं..करोड़ों मजदूर को भूखे रहने की नौबत आ सकती है इसलिए संकट की घडी में वेतन भोगियों का इतना त्याग तो बनता ही है | परन्तु बचपन से हम सबने यही पढ़ा..यही सिखा कि पहले आवश्यकता फिर आराम और उसके बाद विलासिता |अरे साहब, वेतनभोगी तो भारी भरकम आय-कर की कटौती के बाद अपने और अपने परिवार की आवश्यकताओं को अपने तरीके से पूरा करते हैं उसके बाद बचता है तो थोड़ा आराम की सोचते हैं |ख़ुशी है कि हमारा देश विलासिता की ओर अग्रसर है…!

हमारे देश में बुलेट ट्रेन की कुल लागत 1.10 लाख करोड़ रुपये की है, जिसमे 88 हजार करोड़ रुपये जापान सरकार कर्ज देगी | अगर हम इस विलासिता वाले प्रोजेक्ट को, जो सिर्फ दो राज्य के लोगों के उपयोग केलिए होगा, उसे कैंसिल कर देते हैं तो हम दुसरे देश से कर्ज लेने से भी बचेंगे और बची राशि कोरोना संकट में गरीब, किसान, मजदूर भाइयों के काम भी आ जाएगी |

 

पहला कि, हमारे देश में बुलेट ट्रेन की कुल लागत 1.10 लाख करोड़ रुपये की है, जिसमे 88 हजार करोड़ रुपये जापान सरकार कर्ज देगी | अगर हम इस विलासिता वाले प्रोजेक्ट को, जो सिर्फ दो राज्य के लोगों के उपयोग केलिए होगा, उसे कैंसिल कर देते हैं तो हम दुसरे देश से कर्ज लेने से भी बचेंगे और बची राशि कोरोना संकट में गरीब, किसान, मजदूर भाइयों के काम भी आ जाएगी |
दूसरा कि, नए संसद भवन का निर्माण होना है, जिसपर प्राथमिक तौर पर 12450 करोड़ रुपये का खर्च होना है | मेरा कहना है कि आर्थिक संकट नहीं था तब कोई बात नहीं थी..और भी ख़ूबसूरत बिल्डिंग का निर्माण हो जाए, क्या दिक्कत है… लेकिन संकटकाल में जिस देश के अन्नदाता, मजदूर भूखमरी के कगार पर हों, वहाँ इतने खुबसूरत संसद भवन को तोड़कर दूसरा फाइव स्टार वाली सुविधा वाले भवन का निर्माण उस देश केलिए विलासिता ही होगी | केंद्र सरकार को पहले इस प्रोजेक्ट को कैंसिल कर किसान, मजदूर और कमजोरों की आवश्यक-आवश्यकता की पूर्ति इस बुरे वक़्त में करनी चाहिए |तीसरा कि, आम जनता के 25000 करोड़ रुपये बैंक डिपोजीट पर ब्याज घटाने के बाद जो सरकारी खजाने में पैसे आये, आज इस संकटकाल में गरीब जनता की मदद उस राशि से हो।इस संकटकाल में “प्रधानमन्त्री राष्ट्रीय राहत कोष” और “प्रधानमन्त्री केयर कोष” की राशि पारदर्शिता के साथ देश के किसान, मजदूर, गरीब की आवश्यकताओं केलिए इन तक पहले पहुँच जाए तो बहुत अच्छा ..उपरोक्त सभी विलासिता सम्बन्धी राशि के खर्च होने के बाद अगर देश आर्थिक संकट से गुजर रहा होता और हमारे अन्नदाता और मजदूर भाइयों को भूखे मरने की नौबत आती तो वेतनभोगियों और पेंशनधारियों को DA में कटौती तो क्या अपने वेतन में भी कटौती करने को तैयार हो जाते | परन्तु विलासिता केलिए राशि को संजोकर वेतनभोगियों और पेंशनधारियों की हकमारी करना एक अच्छे शासक को शोभा नही देता….इसपर भारत सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए |

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