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स्वास्थ्य

टीकाकरण की गत‍ि तेज रहने की जरूरत

अभी भी देर नहीं हुई है। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।पिछले डेढ़ वर्षोप्रांत भी कोरोना का दंश जारी है। डेटा बेस तथा वैक्सीन की कमी, दूसरी लहर को तीसरी लहर में परिवर्तित कर रही है। घातक कोरोना वायरस को जब तक जड़ से नहीं उखाड़ा जायेगा, तब तक हमारे लोगों की मृत्य होती रहेगी।

 

 

◆ नीलम महाजन सिंह

जिस प्रकार से कोरोना प्रोटोकॉल की उपेक्षा की जा रही है, तीसरी लहर का आना पूर्णतः तय है। कोविड-19 की दूसरी लहर की रफ्तार बेशक मंद पड़ रही हो, लेकिन टीकाकरण की रफ्तार ने तेजी पकड़ी है।अगर हर्ड इम्यूनिटी पाने के लिए हमें अपनी 70 फीसदी आबादी को वैक्सीनेट करना है तो समूचे देश में तेजी से टीकाकरण अभियान चलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों कहा कि राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के तहत सभी देशवासियों को केंद्र सरकार की तरफ से नि:शुल्क वैक्सीन लगेगी। इससे केंद्र व राज्यों के बीच टीकाकरण व टीके के मूल्य को लेकर जारी भ्रम भी दूर हो गया है, इसलिए अब कोई नीतिगत कारण नहीं आता है कि जिसके चलते टीकाकरण में कोई बाधा हो। अब दो चीज महत्वपूर्ण है; पहली, टीकाकरण अभियान में जुटे स्वास्थ्य कर्मियों की तत्परता बनी रहनी चाहिए, उनकी सुविधाओं में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। दूसरी, देश में टीके की उपलब्ब्धता में कमी नहीं आनी चाहिए। अभी दो टीके कोविशील्ड व कोवैक्सीन देश में बन रहे हैं। रूसी वैक्सीन स्पूतनिक-वी बनाने के लिए डा. रैड्डी लैब से करार हुआ है। अभी इसकी वैक्सीन की आपूर्ति में समय लगेगा। दरअसल, भारत की आबादी व विशालता को देखते हुए वैक्सीन बनाने का जिम्मा अधिक से अधिक योग्य कंपनियों को दिया जाना चाहिए था। अभी भी देर नहीं हुई है। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।पिछले डेढ़ वर्षोप्रांत भी कोरोना का दंश जारी है। डेटा बेस तथा वैक्सीन की कमी, दूसरी लहर को तीसरी लहर में परिवर्तित कर रही है। घातक कोरोना वायरस को जब तक जड़ से नहीं उखाड़ा जायेगा, तब तक हमारे लोगों की मृत्य होती रहेगी। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश में कहा कि कोरोना वैक्सीन की खरीद के लिये देशभर में निर्माण की मात्रा को तीव्र कर दिया गया है। कोविशील्ड, कोवैक्सीन व स्पूतनिक-वी की मात्रा, भारतीय जनसंख्या को वैक्सीनेट करने से बहुत कम है। ‘राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान’ को घोषित कर दिया गया है, लेकिन वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित व सुलभ नहीं की गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने प्रधानमंत्री मोदी को आश्वस्त किया है कि अमेरिका से बड़ी मात्रा में वैक्सीन भेजी जा रही है। वह कब मिलेगी, इसका कोई समय तय नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का पर्दाफाश तो पहले ही हो चुका है। कमियों से ऊपर उठ कर हमें आगे का सोचना चाहिए है। निशुल्क टीकाकरण को सफल बनाने के लिए डिमांड एंड सप्लाई के गैप को कम करना होगा। चूंकि जनसंख्‍या अनुपात में टीके की मांग अधिक है और आपूर्ति कम है, ऐसे में ‘टीका निर्माण नीति’ को व्यापक किया जाना चाहिए।अभी तक केवल 26.17 करोड़ लोगों को देश में टीके की पहली डोज दी गई है। इनमें से केवल करीब 4.93 करोड़ लोगों को ही दोनों डोज लगी है। इसमें भी शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में काफी अंतर है। जनसंख्‍या की 13.6 प्रतिशत शहरी आबादी में से 27.2 फीसदी को पहली डोज दी गई है, जबकि 72.98 ग्रामीण जनसंख्‍या में से केवल 14.7 फीसदी को ही टीके की पहली डोज लगी है। लक्ष्‍य बड़ा है, इसलिए वैक्‍सीनेशन को तेज किए जाने की आवश्‍यकता है। कोविड वायरस का डेल्‍टा प्‍लस वैरिएंट भी खतरा बढ़ा सकता है। ब्रिटेन को दुबारा लॉकडाउन इसी वैरिएंट की वजह से करना पड़ा है। ऐसे में भारत के लिए सुस्‍त गति से चलने का वक्‍त नहीं है। टीका उत्पादन के लिए, अगर हम सीरम इंस्टीट्यूट तथा भारत बायोटेक पर निर्भर रहेंगे तो टीके की उत्पादन मात्रा सीमित ही होगी। दोनों कंपनियां बेशक अपनी पूरी क्षमता से टीके बना रही हों, पर ज़रूरत बहुत अधिक है। डा. रेडडी लेब द्वारा स्‍पूतनिक-वी बनाने के बाद भी मांग व आपूर्ति में गैप बने रहेंगे। कोरोना के चलते दो साल से हमारी अर्थव्‍यवस्‍था प्रभावित हो रही है, इसलिए इसका अंत जरूरी है। वर्षों तक हम कोरोना में नहीं उलझे रह सकते हैं।

भारत में ग्‍लोबल मानकों के अनुरूप दवा बनाने वाली कंपनियों की भरमार है। भारतीय कंपनियों की दवाइयां विश्व भर में निर्यात की जा रही हैं। फिर वैक्सीन मैन्युफैकचरर्स को खुले आर्थिक समीकरण के तहत वैक्सीन उत्पादन का लाइसेंस क्यों नहीं देना चाहिए ? टौरेंट, ग्लेनमार्क, बायोकान, कैडिला हेल्थ केयर, डाः रेड्डी लेबोरेट्री, सिपला, अरबिंदो, ल्यूपिन, सन फार्मास्युटिकल्स तथा अन्य भारतीय कंपनियां वैश्विक गुणवत्ता के साथ विश्व भर को दवाइयां दे रही हैं। नि:शुल्क टीकाकरण अभियान के उपरांत, इन सभी कंपनियों को शोध और निर्माण कार्य के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। ‘सोशल कारर्पोरेट रिसपोंसिबिलिटी’ के तहत सभी उद्योगपतियों को टीका निर्माण के लिए फंड बनाने में आर्थिक सहयोग देना चाहिए। जब मायो क्लिनिक अमेरिका में डा: रेड्डी लेब की दवाइयां दी जा रहीं हों, तो भारत में भी टीकाकरण कार्यक्रम को वास्तविक स्वरूप तभी दिया जा सकता है, जब महत्वपूर्ण फार्मास्युटिकल् कम्पनियों को निर्माण हेतु सहयोगात्मक बनाया जाये। भारत बायोटेक की चेयरपर्सन डा. कृष्णा ऐला ने वैक्सीन निर्माण मे तीव्रता लाने की प्रक्रिया का आह्वान पहले ही किया था। बायोकॉन की चेयरपर्सन किरण माजुमदार शॉ ने एक वर्ष पूर्व कहा था, कि भारत की जनसंख्या और डेटा आभाव के कारण अनेक कठिनाइयां सामने आएंगी।
कोरोना का प्रकोप ग्रामीण भारत में हो चुका है। अनेक राज्‍यों में वैक्सीन की कमी होने पर, कठिनाइयां आ रहीं हैं। अधिक मांग की पूर्ति – अधिक उत्पादन द्वारा ही संभव है। पिछले सप्ताह केंद्र सरकार और राज्‍यों की खींचातानी समाचार पत्रों की खबर बनी। वैकसीन मांग की व्यापकता पारस्परिक आपूर्ति के बिना अर्थहीन है। आपूर्ति के मामले में हमें पूरा विवरण देने का प्रयास करना चाहिए। इन आयामों के बिना टीका आपूर्तिकरण पर बयान अधूरा साबित हो सकता है। “घर घर टीका” अभियान, मात्र नारा बन कर नहीं रह जाये, इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने निजी कंपनियों द्वारा निर्मित वैक्सीन को मंजूरी देने की घोषणा की है। अब खरीद की ज़िम्मेदारी तो केंद्र सरकार पर है, इसलिए राज्‍यों को टीकाकरण कार्यक्रम को कार्यान्वित करने की ओर ध्यान देना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तेज टीकाकरण कार्यक्रम का आग्रह किया है। अमेरिका में तो अस्सी प्रतिशत वैक्सीन लग चुकी है। यूरोपीय देशों ने वैक्सीनेशन प्लान को सफलतापूर्वक लागू किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मेक्रों तथा प्रधान मंत्री योन कासटेक्‍स को खुले आम कैफे मे काफी पीने के वीडियो ने विश्व भर को आश्वस्त किया है कि हम भी कोरोना मुक्त राष्ट्र बन सकते हैं। अनुमानित तीस करोड़ लोग, जुलाई तक वैक्सीनेट होंगे, यह संख्‍या कम है। अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वास्थ्य सलाहकार डा. ऐनटोनी फौची ने भारत को सलाह दी है कि वैक्सीनेशन प्रक्रिया को तेजी से लागू किया जाये। फौची के अनुसार, अमेरिका ने सफल वैक्सीनेशन प्लान के कारण ही कोरोना वायरस को मात दी है। भारत को इस ओर ध्‍यान देना चाहिए।
टीकाकरण अभियान के दम पर अतीत में भारत चेचक और पोलियो जैसी घातक बीमारियों को दूर करने में सफल रहा है। इसी तरह कोरोना वायरस के ताबूत में आखिरी कील ठोकने के लिए राष्‍ट्रीय टीकाकरण अभियान को सफल बनाने की आवश्‍यकता है। इसमें जनता का भी योगदान महत्वपूर्ण है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार, विचारक, राजनैतिक समीक्षक, दूरदर्शन समाचार संपादक एवं मानवाधिकार संरक्षण अधिवक्ता हैं।)

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