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राजनीति

कुर्सी जानेवाली थी नीतीश की,मुख्यमंत्री बनते आरसीपी सिंह !

नई दिल्ली:पिछले दिनों महाराष्ट्र की सियासत में आए उबाल ने आखिरकार राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी लेकर ही मानी । पूरी कवायद कुर्सी के लिए थी इसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी गई और उद्धव ठाकरे की ही पार्टी के बागी विधायकों के नेता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। सियासत में सब चलता है। कहा जाता है कि क्या सियासत में कोई किसी का अपना नहीं होता। ऐसा ही कारनामा महाराष्ट्र में भी हुआ और देखते ही देखते उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री से पूर्व मुख्यमंत्री हो गए और उनके जूनियर एकनाथ शिंदे मंत्री से मुख्यमंत्री बन गए । इस पूरे एपिसोड में शह और मात का खेल चलता रहा। कुल मिलाकर महाराष्ट्र का बवंडर एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही शांत हो गया है।भविष्य में क्या कुछ होता है यह देखने वाली बात होगी लेकिन महाराष्ट्र के एपिसोड में राजनीतिक पंडितों ने इस बात का अंदाजा लगाया है कि महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ वह बाद में होता उससे पहले इस तरह की चालबाजी बिहार में होनी थी ।नंबर तो महाराष्ट्र से पहले बिहार का था। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक महाराष्ट्र में जो कुछ भी शिवसेना के साथ हुआ वैसा ही कुछ बिहार में भी सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के साथ होने वाला था । बिहार में शिवसेना के बदले जदयू को होना था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की तरह बिहार में रचे जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र में ठाकरे की जगह नीतीश को, एकनाथ शिंदे के बदले RCP सिंह को फिट किया जाना था।

 

 

 

राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना था कि महाराष्ट्र के एपिसोड में जिस तरह से विधायकों को पहले गुजरात ले जाया गया फिर वहां से आसाम ले जाया गया वैसे ही बिहार में होने वाले राजनीतिक उठापटक को अंजाम देने के लिए विधायकों को गुवाहाटी के बदले नेपाल जाना था। लेकिन अंतर यही था की ठाकरे को सत्ता मिली है बाबू से जबकि नीतीश ने सत्ता हासिल की है काबू से। नीतीश ने ये पहले ही भांप लिया था और इसलिए RCP को राज्यसभा ना भेज पर कतरने की कवायद हुई थी। महाराष्ट्र की घटना के बाद बिहार की राजनीति को नजदीक से समझने और जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने अपने विश्लेषण से पूरी तरह इस बात को सिद्ध कर दिया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दूरदर्शी राजनेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं और कई ऐसे मौके आए हैं जब उन्होंने खुद को साबित करते हुए न सिर्फ यह की अपनी सत्ता बचाई है बल्कि अपने विरोधियों को चारों खाने चित भी किया है। वह चाहे 2015 से पहले एनडीए गठबंधन से अलग होने का फैसला हो या फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद के साथ गठबंधन। नीतीश कुमार ने हर मौके पर अपने आप को स्थापित नेता के तौर पर सिद्ध किया है और विरोधियों की चाल से अपने आप को बचाए रखा है। यही वजह है कि महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल के बाद अपने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी गंवा चुके उद्धव ठाकरे और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तुलना में राजनीतिक विश्लेषक नीतीश कुमार को निपुण मानते हुए यह कहने से नहीं हिचक रहे हैं कि नीतीश कुमार ने हालात को पहले ही भांपकर अपनी कमान से तीर निकाल दी थी इसका नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके रणनीतिकारों का बिहार में रचने वाला चक्रव्यू असफल हो गया जब कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और उनकी कुर्सी चली गई।

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