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श्रीलंका में विफल संयुक्त राष्ट्र

पुष्परंजन

‘दस्तूर‘ की अंतिम लाइन में हबीब जालिब ने लिखा-‘चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूं?/ तुम नहीं चारागर कोई माने मगर, मैं नहीं मानता/ मैं नहीं जानता।‘ संयुक्त राष्ट्र को ‘चारागर‘ हम इसलिए मानते हैं कि दुनिया में जहां कहीं दुःख-तकलीफ, समस्या हो, दूर करना उसकी जवाबदेही है। ‘आरोग्यसाधक‘, ‘हीलर‘, यानी चारागर। 7 सितंबर 2018 से हना सिंगर हम्दी, कोलंबो में यूएन कोआर्डिनेटर की ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की 22 एजेंसियां श्रीलंका में एक्टिव हैं, उन सबों में समन्वय स्थापित करना हना सिंगर का काम है। हना ने कैरो यूनिवर्सिटी से पाॅलिटिकल सोशियोलाॅजी से मास्टर्स किया हुआ है। इसलिए कन्फ्लिक्ट एरिया के राजनीतिक समाजशास्त्र को समझना हना सिंगर के लिए कोई मुश्किल काम नहीं।

हना सिंगर हम्दी ने 10 जून 2022 को 47. 2 मिलियन डाॅलर तत्काल मुहैया कराने की अपील की थी, ताकि श्रीलंका के 57 लाख लोगों को जीने के लिए आवश्यक वस्तुएं दी जा सके। हना ने बयान दिया कि इनमें से 17 लाख लोग संकट की स्थिति में आ चुके हैं, इनका जीवन जोखिम में पड़ चुका है। इस अपील के एक महीना छह दिन होने जा रहे हैं, कोई सुनने वाला नहीं। क्या संयुक्त राष्ट्र के पास 47. 2 मिलियन डाॅलर का इंतज़ाम नहीं है? फिर इस संस्था के रहने, न रहने का मतलब क्या है?

संयुक्त राष्ट्र को भेजे मेल में हना हम्दी ने लिखा कि 47. 2 मिलियन डाॅलर मदद के वास्ते आ जाए, तो संकटग्रस्त लोग सितंबर तक अपना काम चला लेंगे। उन्होंने जानकारी दी कि श्रीलंका में आबादी का एक बड़ा हिस्सा आधे वक्त का खाना छोड़ चुका है। बीज और खाद के अभाव में 24 फीसद खेती बर्बाद है। लोग अपने घरों के फर्नीचर और दूसरे सामान बेचकर खाने की चीज़ें जैसे-तैसे ख़रीद रहे हैं।

हना हम्दी पिछले तीन महीनों से विभिन्न मीडिया माघ्यमों को लगातार बताती रही हैं कि इस देश में हालात बद से बदतर कैसे होते गये। मई 2022 में ही यूएन कोआर्डिनेटर ने बताया था कि श्रीलंका में खाद्य मुद्रास्फीति 57.4 फीसद पर पहुंच चुकी है। श्रीलंका में चैतरफा तबाही का ज़िक्र कर तत्काल मदद की अपील करने वाली हना हम्दी असहाय सी दिख रही हैं। क्या मतलब निकालें? यूएन फेल हो चुका श्रीलंका में, यही तो निष्कर्ष निकलता है।

कन्फ्लिक्ट ज़ोन में संयुक्त राष्ट्र कोई पहली बार विफल नहीं हुआ है। आप पिछले दो वर्षों के रिकार्ड देखेंगे, तो म्यांमार के बाद अफ़ग़ानिस्तान, और उसके बाद श्रीलंका संयुक्त राष्ट्र की रणनीतिक विफलता की दर्दनाक दास्ताँ प्रस्तुत करता रहा है। जून 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार पर रिपोर्ट जारी की, जिसे तैयार करने में किसी निष्पक्ष जाँचकर्ता की मदद ली गई थी। रिपोर्ट काफी तीखी थी, जिसमें दस वर्षों का ब्योरा देते हुए बताया गया कि म्यांमार में संयुक्त राष्ट्र की सभी एजेंसियों का रोल कितना ख़राब रहा है।

बान की मून जो जनवरी 2007 से दिसंबर 2016 तक संयुक्त राष्ट्र महासचिव थे, उनकी भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी उस रिपोर्ट में है, ‘बान की मून या तो अक्षम थे, अथवा म्यांमार की समस्या सुलझाना नहीं चाहते थे।‘ अंटोनियो गुटरस जो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव हैं, उन्होंने उस रिपोर्ट के हवाले से स्वीकार किया था कि पिछले पांच वर्षों में रोहिंग्या का दमन जिस तरह उस देश में हुआ, यूएन मूक दर्शक की भूमिका में ही रहा था। संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटरस, म्यांमार में ‘यूएन सिस्टम फेल्योर‘ के लिए स्वयं को कोड़े से मारते रहे।

अफग़ानिस्तान यों भी एक फेल्ड स्टेट रहा है, मगर उस इलाक़े में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कई सवाल खड़े करती है। देबोरा ल्योंस संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि और यूएन असिस्टेंस मिशन इन अफ़ग़ानिस्तान (यूएनएएमए) के ओहदे को संभालती रही हैं। 17 नवंबर 2021 को उनका बयान आया कि मानवीय संकट से ग्रस्त अफग़ानिस्तान को ऐसे ही छोड़ देना, ऐतिहासिक भूल रही है। अफग़ानिस्तान के 11 सबसे घनी आबादी वाले इलाके में से 10, इस समय भयावह अन्न संकट से गुज़र रहे हैं।

दो करोड़ 30 लाख अफ़ग़ानों के सामने आबोदाना की समस्या है। उनके लिए राशन-पानी जुटाना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बयान के नौ महीने हो चुके। बाक़ी विषयों को तो छोड़िये, कोई पूछे, संयुक्त राष्ट्र ने केवल खाद्य समस्या के निदान के लिए अफग़ानिस्तान में किया क्या है? केवल तालिबान का रोना, और बातफरोशी।

जाॅन बोल्टन जब संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के स्थाई दूत थे, डेली टेलीग्राफ से एक इंटरव्यू में खुलकर कहा था कि यूएन उम्मीदों को तोड़ देने वाली संस्था है। मार्च 2006 में गाॅलअप ने अमेरिका में एक सर्वे कराया था, जिसमें 64 फीसद अमेरिकी जनता की राय थी कि यूएन का प्रदर्शन बहुत ही ख़राब रहा है। ‘गाॅलअप पोल‘ कराने की वजह यह थी कि संयुक्त राष्ट्र के लिए सर्वाधिक अनुदान अमेरिका से जाता है।

जिस देश से हर वर्ष संयुक्त राष्ट्र को पांच अरब डाॅलर से अधिक अनुदान जाता हो, स्वाभाविक है कि वहां के करदाता यह जानना चाहेंगे कि उनके पैसे का दुनिया भर में कितना सदुपयोग हो रहा है। अमेरिका वर्ल्ड फूड प्रोग्राम का 48 प्रतिशत ख़र्च वहन करता है। शरणार्थियों के लिए बने आयोग के बजट का 31 फीसद अमेरिका देता है, यूनिसेफ के बजट का 17 प्रतिशत, पीस कीपिंग आपरेशन का 27 फीसद ख़र्च वहन करना अमेरिका के ज़िम्मे है, तो ज़ाहिर है ऐसे कार्यक्रमों में अमेरिकी चौधराहट बनी रहेगी।

रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में शांति स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र की जो टीम गई, उसमें अमेरिका ने 759 मिलियन डाॅलर ऑपरेटिंग बजट पर ख़र्च किये। मगर, क्या कांगो में शांति मिशन सफल रहा था? 7 अप्रैल से 15 जुलाई 1994 तक रवांडा गृहयुद्ध की चपेट में था। पांच से आठ लाख लोग मारे जा चुके थे। रवांडा में तुत्सी नरसंहार को यूएन के लोग मूक दर्शक होकर देखते रहे। दुनिया वही सवाल 20 दिसंबर 1995 को बाल्कन में भेजे यूएन प्रोटेक्शन फोर्स को लेकर दरपेश करती है।

बोस्निया-हर्जेगोविना, क्रोएशिया, युगोस्लाविया में नरसंहार यूएन फोर्स के रहते नहीं रूका, तो इसे विफलता नही तो क्या कहेंगे? अंततः बाल्कन देशों से यूएन प्रोटेक्शन फोर्स को वापिस करना पड़ा, और उन जगहों पर नाटो के सैनिकों की तैनाती हुई। सूडान के दार्फूर में 26 फरवरी 2003 को लड़ाई छिड़ी। 19 साल चार महीने के काले कालखंड में रूक-रूक कर नरसंहार होता रहा। 2013 में संयुक्त राष्ट्र ने तीन लाख लोगों के मारे जाने का आकलन किया था। फिर भी इसे नरसंहार न मानने की वजह क्या रही है? इस सवाल का उत्तर यूएन के अधिकारी नहीं देते।

कांगो में अनाज के बदले औरतों की अस्मत लूटने वाले कोई और नहीं, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के लोग होते थे। इसकी ख़बर जब कोफी अन्नान को लगी वो निःशब्द थे, शर्म से सिर नहीं उठा सके। कांगो से कोई दो हज़ार किलोमीटर की दूरी पर दार्फुर है। वहां नरसंहार रोकने आये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा बलों ने औरतों के शरीर नोचने का काम नरपिशाचों की तरह किया। अन्नान ऐसी राक्षसी हरकतों की केवल भर्त्सना करके रह गये। और कर भी क्या सकते थे?

यूएन का और भी विकृत चेहरा देखना हो, तो 1996 के ‘ऑयल फाॅर फूड प्रोग्राम‘ को देखिये। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कार्यक्रम था, जिसके तहत इराक की भूखी जनता को तेल के बदले अनाज देना तय हुआ था। यह प्रथम गल्फ वार की बात है, जब इराक़ पर प्रतिबंध लगाया गया था। सद्दाम हुसैन ने आपदा में भी अवसर तलाश लिया था। सरचार्ज के नाम पर उसने एक अरब 80 करोड़ डाॅलर बटोरे, और विभिन्न कंपनियों की मिलीभगत से तेल की तस्करी कराई, जिसमें 10.9 अरब डाॅलर की बंदरबाँट की।

जब विश्वव्यापी हल्ला हुआ, तो यूएन की कमेटी को जांच सौंपी गई, जिसकी रिपोर्ट 27 अक्टूबर 2005 को रिलीज़ हुई। 623 पेज की उस रिपोर्ट में 4500 कंपनियों को ‘ऑयल फाॅर फूड प्रोग्राम‘ में लूट का हिस्सेदार माना गया। इस कमेटी के चेयरमैन पाॅल वोल्कर की टिप्पणी थी, ‘विश्व की सबसे पाॅवरफुल बाॅडी एक ऐसे भ्रष्ट कार्यक्रम का हिस्सा बन गई, जिसकी विफलता की वजह से सद्दाम हुसैन की जेब में एक अरब 80 करोड़ डाॅलर समा गये।‘ चेयरमैन पाॅल वोल्कर ने अपनी उस रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान, उनके डेप्युटी और सुरक्षा परिषद के बड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े किये।

शशि थरूर ने कोफी अन्नान के मातहत काम किया था। 18 अगस्त 2018 को स्वीट्जरलैंड की राजधानी बर्न में कोफी अन्नान 80 साल की उम्र में गुज़र गये। शशि थरूर ने कोफी अन्नान को याद करते हुए, उन्हें अपना गुरू बताया था। उस पहेली को शशि थरूर ही सुलझा सकते हैं कि ‘ऑयल फाॅर फूड प्रोग्राम‘ में अरबों डाॅलर के जो वारे-न्यारे हुए, उसमें कोफी अन्नान की क्या भूमिका थी? एक दूसरे नेता के. नटवर सिंह हैं, जिनके 2001 में इराक़ दौरे को लेकर अक्सर सवाल पूछा जाता रहा कि तेल के बदले अनाज कार्यक्रम में उनके रिश्तेदार की कंपनी को कितना लाभ मिला था?

दुर्भाग्यवश, श्रीलंका इराक की तरह तेल का उत्पादन नहीं करता। बल्कि तेल संकट की वजह से ही वहां सरकार हिल गई। उसके पास खाने को अनाज नहीं है। खाना पकाने के लिए गैस नहीं है। खेत में डालने को खाद नहीं है। एकदम नंगा-बुच्चा। ऐसे देश में किस चीज के बदले आप खाद्य सामग्री, डाॅलर या तेल देंगे? इसलिए यूएन कोआर्डिनेटर हना सिंगर हम्दी सहायता की जब गुहार लगाती हैं, चारो ओर सन्नाटा पसर जाता है। गुज़िश्ता रविवार को आदिस अबाबा में अफ्रीक़ी यूनियन की 28 वीं शिखर बैठक थी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव, अंटोनियो गुटरस ने उस मौक़े पर कहा कि यदि हम अफ्रीक़ा में फेल कर जाते हैं, समझिए पूरी दुनिया में फेल कर गये। काश, अंटोनियो गुटरस एकबार श्रीलंका की ओर झाँक लेते!

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