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राजनीति

काँग्रेस सत्ता पाना तो दूर विपक्ष तक बनने को तैयार नहीं

स्मृति ईरानी अमेठी हारी थी लेकिन डंटी रही और अगली बार राहुल गाँधी को हरा दिया। भाजपा काँग्रेस दोनों ही एक समय में उत्तर प्रदेश से साफ हो गयी थी, अब भाजपा दो बार से सत्ता में है और काँग्रेस… गुजरात में पिछली बार काँग्रेस ने जबरदस्त टक्कर दी थी। पिछले 5 साल में उन्हें सिर्फ डंटे रहना था, परिणाम आज अलग होता। लेकिन आलस से भरपूर पार्टी न्यूटन की तरह सेब के पेड़ के नीचे लेटे हुए फल के खुद गिरने का इंतजार कर रही है।

 

नवीन चौधरी
चलिये मजे ले लिए लेकिन गुजरात का रिजल्ट बहुत अलार्मिंग है लोकतंत्र और काँग्रेस दोनों के लिये। भाजपा जीते या काँग्रेस, आम जनता के लिए एक मजबूत विपक्ष बहुत जरूरी है। काँग्रेस सत्ता पाना छोड़िये विपक्ष तक बनने को तैयार नहीं है। स्मृति ईरानी अमेठी हारी थी लेकिन डंटी रही और अगली बार राहुल गाँधी को हरा दिया। भाजपा काँग्रेस दोनों ही एक समय में उत्तर प्रदेश से साफ हो गयी थी, अब भाजपा दो बार से सत्ता में है और काँग्रेस… गुजरात में पिछली बार काँग्रेस ने जबरदस्त टक्कर दी थी। पिछले 5 साल में उन्हें सिर्फ डंटे रहना था, परिणाम आज अलग होता। लेकिन आलस से भरपूर पार्टी न्यूटन की तरह सेब के पेड़ के नीचे लेटे हुए फल के खुद गिरने का इंतजार कर रही है।

 

 

काँग्रेस के नेता तो नेता उसके समर्थक बुद्धिजीवी भी एक अलग समस्या है। उनमें और मोदी भक्तों के बीच एक बड़ी समानता यह है कि कुतर्कों से बचाव करना चाहते हैं। भारत जोड़ो यात्रा शानदार नैरेटिव सेट कर सकती थी, लेकिन यह एक बड़ा फ़ोटो इवेंट बन कर रह गया। कोई उस पर बात करने की जगह ‘कितनी प्यारी तस्वीरें’ बोलकर खुश हैं। (श्याम रंगीला का ताजा वीडियो देखिये)। जो नहीं है राहुल में उस पर काम करने की जगह उसके गलत कम्युनिकेशन का बचाव है। कोई काँग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनना चाहता था और जो बनना चाहता था (थरूर) उसे बनने नहीं दिया। समर्थक मूर्खतापूर्ण कारण देकर खड़गे का बचाव करते रहे। जरूर करें लेकिन फिर भाजपा को दोष देकर खुश न हों। भाजपा जिसमें अच्छी है वह कर रही है। कांग्रेसी लोगों को यह भी समझना होगा कि जिसे मुद्दा बना रहे हैं वो, क्या वह वाकई जनता के लिये मुद्दा भी है? क्या किसी को अंदाज़ा है कि निम्न आय वर्ग क्यों भाजपा की ओर मुड़ गया है? प्लीज, वो घिसा पिटा धर्म वाला मत लाना। वह एक मुद्दा जरूर है लेकिन सिर्फ उससे होना होता तो बहुमत 1992 के बाद आ गया होता।

 

राहुल गाँधी वही गलती कर रहे हैं जो उनके पिता ने की। उनके इर्द-गिर्द या तो वामपंथी आ गए या वो स्वार्थी तत्व जो अपने एजेंडा के हिसाब से कांग्रेस का एजेंडा बना रहे हैं। खुद को निष्पक्ष कहने वाला मोदी विरोधी पत्रकार राहुल गांधी को जाकर कहता है कि आपके भाषण सुने, कितनी प्यारी बात करते हैं। कहता है कि मुझे मोदी पर ट्वीट करने पर नौकरी से निकाला पर ये नहीं बताता कि उसने दफ्तर गया ही नहीं कभी। एक और पत्रकार ऐसे ही मोदी को नौकरी जाने का कारण बताता है पर ये नहीं बताता कि वह मीडिया की नौकरी के बाद AAP का सोशल मीडिया टीम संभालता था। उसे ड्यूल एम्प्लॉयमेंट के लिए नौकरी से निकाला। ऐसे लोग पहले भी काँग्रेस में आये और एक दिन ये लोग भी ग्रुप में शामिल हो जाएंगे और काँग्रेस का एजेंडा वो सेट करवाएंगे जिसपर सिर्फ इनकी विचारधारा के लोगों को भाषण देना होता है। जनता तक जब बात ही नहीं पहुँचती तो वो क्या वोट देगी।याद रखिये जब आलोचना होती है तो उसमें आपकी कमी भी दिखाई पड़ती है। उस कमी पर काम करने की जगह अगर आप बचाव करने लगते हैं तो अपने आगे खड्डा खुद खोदते हैं।

 

अब कोई न कोई हिमाचल के रिजल्ट बताने यहाँ आएगा जरूर इसलिये पहले ही बता दूँ भाजपा हारकर मजबूत विपक्ष बन गयी। वह 68 में से 29 सीट पर है और कांग्रेस गुजरात में 182 में 16 पर। नियमानुसार वह उधर नेता प्रतिपक्ष भी नहीं बना सकता। ये ट्रेंड लोकसभा में काँग्रेस की हार से शुरू हुआ और अब राज्यों में है। समय मिले तो श्याम रंगीला का भारत जोड़ो यात्रा पर लेटेस्ट वीडियो देखिये। जो मजा राहुल गांधी देश को देना चाहते हैं वह मजा इस व्यक्ति ने दिया है।

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