आज फणेश्वर नाथ रेणु सौ साल के हो गए हैं। उन्हीं के साथ उनके सभी पात्र भी मानों सौ साल के हो गए हैं। जिला पूर्णिया के औराही-हिंगना गाँव में आज जश्न का माहौल है। रेणु अपने दरवाजे पर बैठे हैं और उनकी समस्त कृतियों के पात्र बदले परिवेश में एक-एक कर उनकी आँखों के सामने घूम रहे हैं
बाँभन टोली के फुटंगी कहते हैं पूरे गाँव-टोले में अब पंचलैट कहीं भी देखने तक को नहीं मिलती…किरासिन तेल का टिटिम्मा। लेकिन उस दिन, अलबत्ता गोधन ने टोले की इज्ज़त बचा ली थी, फिर गुलरी काकी भी मान गईं। ‘सलम-सलम’ वाला सलीमा का गीत गाकर आँख का इशारा मारता था गोधन।
‘हम तुमसे मोहब्बत करके सलम !…
गोधन-मुनरी की शादी हो गई है। उनके बच्चे गाँव वालों पर हँसते हैं कि एक ज़माने में टोले के दीवान, सरदार और छड़ीदार अगनू महतो पंचलैट बालना भी नहीं जानते थे…अब तो घर-घर एलईडी लाइट लगी है।
हिरामन के पीठ में गुदगुदी लगती है…
हिरामन ने बैलगाड़ी हांकना बंद कर दिया है। कहता है कि बैल-बर्धा रखने का अब करेजा नहीं बचा। लेकिन बैल और गाड़ी बेंचने की हिम्मत नहीं हुई। टीशन से सवारी ढोता है। आने-जाने वाली हर गाड़ी के आँखों से ओझल होने तक वहीं ठिठक कर खड़ा रहता है। सवारी हल्ला करती हैं, “टेम्पू भर गया है, अब कौन सवारी बची है डलेबर जी?
“हर गुज़रते डिब्बे से हिरामन को एक बैंगनी रंग की साफी हिलती हुई दिखती है..”
हीराबाई जा रही है..
“अब तुम भी जाओ मीता”
इस्स !
आख़िरी डिब्बा!
हिरामन अपने दाहिने पैर के अँगूठे को बाएँ पैर की एड़ी से कुचल लेता है…
सौदागर ने महुआ घटवारिन को खरीद जो लिया…
मेला टूट गया। दुनिया के सारे मेले टूट गए। हिरामन की दुनिया भी खाली हो गई।
टेम्पू पर बैठते ही हिरामन की पीठ में फिर से गुदगुदी लगती है। वह अँगोछी से पीठ झाड़ लेता है। कभी-कभार जाकर अपनी बैलगाड़ी में बैठता है हिरामन। वही फेनूगिलासी की बोली ! रह रह कर बैलगाड़ी में चंपा का फूल खिल जाता है। मह-मह महकती है उसकी बैलगाड़ी।
“मोहब्बत की अगर कभी कोई खुशबू हुई होगी तो वो ऐसी ही होती होगी…
“इस्स…!
जा रे जमाना !
पँचकौड़ी मिरदंगिया ने कई बार कोशिश की कि चरवाहा मोहना छौंड़ा रसपिरिया बजाना सीख ले। एक ज़माना था जब बाबू-बबुआन के यहाँ विदापत वालों की बड़ी इज्ज़त होती थी। लेकिन मोहना निकला नई उमर का छौंड़ा। वो डीजे को पसंद करने लगा है, अभी पिछले महीने ही बसंत पंचमी पर डीजे पर नागिन धुन पर खूब नाचा था। नई उमिर के लड़के…बिदापत नाच में नाचने वाले ‘नटुआ’ को अब कौन देखे। सब डीजे पर डांस करने लगे हैं। मोहना बार-बार पँचकौड़ी मिरदंगिया को चिढ़ाता है। ‘तुम कहते हो कि तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई थी। डायन ने बान मारकर तुम्हारी उंगली टेढ़ीकर दी है…झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय…अब क्या चाहते हो? मेरी भी…?
मिरदंगिया को रमपतिया की याद आ जाती है और बिचारा बूढ़ा मिरदंगिया, मोहना को ‘बेटा’ कहते-कहते रुक जाता है। लेकिन मोहना मानता है कि मिरदंगिया गुनी आदमी है। उस दिन रमपतिया से कहा भी था। उस बार मिली थी रमपतिया…गुलाब बाग के मेला में…समय का फेर ! मेला-रेला सब ख़तम सा हो गया। उसी मिरदंग को कलेजे से सटाकर रमपतिया ने कितनी रातें काटी थीं ! पँचकौड़ी भी मिरदंग को छाती से लगा लेता है।
“भैया महेन्दर…सिमराहा की सपाट धरती पर हज़ारों पेड़ लग गए हैं।”
धूसर, वीरान, अन्तहीन, प्रान्तर। पतिता भूमि, परती जमीन, वन्ध्या धरती…।
परानपुर से पागल भिम्मल मामा आये हैं, बता रहे हैं सफेद बालूचरों में चरने वाली हंसा-चकेवा की जोड़ी के साथ-साथ वन्ध्या धरती की व्यथा को समझने वाली पंडुकी के बारे में !
वैशाख की उदास दोपहरी में पंडुकी करुण सुर में पुकारती है—तुर तुत्तु-उ-उ,तू-उ, तुःउ, तूः। अर्थात्, उठ जित्तू…
पगलेट जित्तू उठ गया…
जित्तन बाबू ने कोसी पर बाँध बनवा दिया है…
चाँदनी रात के आकाश में बावली टिटहरी की आर्त टेर, टिहिंक-टिहिं…टिहिंक !
मिथिला के गद्य में भी विद्यापति सम्भव हो सकतें हैं…
‘धूसर, वीरान, अन्तहीन, प्रान्तर, बन्ध्या धरती,
‘परती परिकथा’, आसन्नप्रसवा’ में तब्दील हो गई है…
मेरी गंज में सब कुछ बदल सा गया है। कमला मैया सूख गई हैं। प्रदूषण के कारण। कैंथ टोले वाले सिंह जी पर आरोप लगाते हैं, तहसीलदार साहब कहते हैं, सब ई सिंघवा का किया धरा है। उधर रामकिरपाल सिंघ तहसीलदार विसनाथ परसाद पर शक करते हैं।
बाँभन टोले के सहदेव मिसर कहता है कि घोर कलजुग है, अभी क्या देखा..?
बालदेव ने राजनीति छोड़ दी है। लक्ष्मी को लेकर अपने गाँव चन्ननपट्टी वापस चले गए हैं। कह रहे थे वो बात कुछ और थी। अंग्रेज बहादुर के ज़माने की…आज के अनसन अंडोलन में वो धार नहीं…अंग्रेज बहादुर के राज में…रोआं-रोआं कलप उठता था…कभी-कभी भावुक होकर गा उठते हैं बालदेव, तैवारी जी का गीत, “गंगा रे जमुनवाँ की धार नयनवाँ से नीर बही…”
जोतखी काका, आँय-आँय, साँय-साँय करते रहते हैं उनकी बात कोई भी नहीं सुनता। वो कहते फिर रहे हैं ई कोरोना-फोरोना कुछ नहीं है। सब विदेशी ताकतों की साजिश है। हम नहीं लगवाएंगे इसकी भैक्सीन। ये बाहर वाला सूई भोंक कर सबको बीमार कर देगा।
सुमरितदास को अब बेतार नहीं, बल्कि मोबाइल कहते हैं, सभी टोला वाले…उसदिन सहदेव मिसर कह रहा था…
मठ उजड़ गया है। रामदास का चाल-चलन ठीक नहीं निकला। लरसिंघदास कहता है कि अंगूठा टेक को महंती सौंपोगे तो और क्या होगा। मैं होता तो बीजक भी अंग्रेज़ी में ही बांचता…महंथ सेवादास का जमाना और था…
बावनदास बहुत उदास रहता है। बार-बार कंठी छूकर गान्ही महतमा की कसम खाता है। कोई भी समस्या आने पर बोलता है महतमा जी पर भरोसा रखो…वो सब कुछ सही कर देंगे। लेकिन दुखी हो जाता है जब देखता है आज की पीढ़ी गान्ही बाबा से ज़्यादा गोडसे को जानने लगी है। जमाहिर लाल, रजिन्नरबाबू, जयपरगास बाबू को लोग भूल ही गये।
सेता-राम, सेता-राम कहते हुए फिरता रहता है बावन। सब कहते हैं बावन सटक गए हैं।
कमली ने गणेश को भी बुला लिया है, उसके मामा के यहाँ से। नीलोत्पल दिन भर उसी के साथ खेलता है, उसी के साथ स्कूल जाता है। तहसीलदार विसनाथ प्रसाद की तहसीलदारी चली गई है। उन्हें मति भ्रम हो गया है। बार-बार यही बड़बड़ाते हैं नक्शा लाओ, नक्शा लाओ, पैमाइश करानी है। लगान बकाया है सबको बुलाओ…
रामकिरपाल सिंघ ने सारा खेत रेहन पर रख दिया है। अब कोईभी खेती-किसानी में रूचि नहीं लेता। खेती-किसानी बड़ी मँहगी हो गई है।
जेहल से छूटने के बाद कामरेड कालीचरन बहुत बड़ा नेता बन गया है। कामरेड वासुदेव नेपाली मोरंगिया गांजा रखने के चक्कर में जेहल चला गया।
रात में भी आँख पर रेभैन का धूप-छाँहा काला चसमा लगाकर भाटा का जूता पहन कर शान झाड़ता था…
मच् मच् मच्…
बेतार मतलब मोबाइल सुमरितदास से उस दिन अंग्रेज़ी बोल रहा था, ‘औल रैट ! कल चखावेगा नेपाली माल।’
खोफिया पुलिस हर जगह घूम ही रही थी। बस फिर क्या! धर लिया। सुना है इस बार चीनिया और नेपलिया पाटी से भी सांठ-गाँठ कर लिया था बसुआ ने।उस दिन कालीचरन कह रहा था…’लाल सलाम कामरेड..! बहुत उड़ रहा था बसुआ। वो अपनी पाटी का आदमी नहीं…’
गुअर टोले का अखाड़ा बंद हो गया है। इस्कूलिया लड़के अखाड़ा नहीं लड़ना चाहते। बिरजू कह रहा था, पुरनिया टीशन के सामने जिम खुल गया है…जिम के सामने से गुज़रने पर देह कसमसाने लगता है। सब शहरी-देहाती इसकुलिया लड़के आते हैं। अब अखाड़े-वखाड़े को कौन पूछता है।शोभन मोची को नई गंजी और गमछा मिलता रहता है…कभी कभी वह अखाड़े का ढोल निकाल लेता है और मन मसोस कर..
ढाक-ढिन्ना, ढाक-ढिन्ना,
अलबत्त ताल काटता है, शोभन !
प्यारु ने डागडर के यहाँ कम्पोंडरी सीख कर अपनी डिस्पेंसरी खोल ली है। छोटका डॉक्टर बन गया है। होमापैथी और अलोपैथी दोनों की दवाई देता है। किसी को कोई भी बीमारी हो, सबसे पहले ग्लूकोस की बोतल साट देता है..
राम खेलावन यादव ने डेरी खोल ली है। उसका बेटा सकलदीप गाँव-गाँव से सप्लाई लेता है।
ममता बहुत बड़ी डॉक्टर बन गयी है। डॉ प्रशांत कुमार के साथ उसने मेरीगंज में बहुत काम किया है। दोनों ने कोरोना काल में पूरे गाँव में बहुत मदद की। उस दिन डॉक्टर प्रशांत कहा रहा था, ‘मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहाएंगे..कम-से-कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाए ओंठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ…
रेणु की आँखों से दो बूँद गर्म सा कुछ लुढ़क जाता है। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “नहीं-नहीं ! यह अँधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है – पवित्र वाणी ! प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय !”
“युगों से सोई हुई ग्राम-चेतना तेजी से जाग रही है…”
कोठी के बगीचे में, अंग्रेजी फूलों के जंगल में, पगले मार्टिन की परी जैसी पत्नी मेरी की कब्र की घास-फूस साफ़ करके किसी ने वहाँ पान-सुपारी और फूल चढ़ा दिए हैं और कालीमुद्दींपुर घाट पर चेथरिया पीर में मानत करके एक चीथड़ा और लटका दिया है।
मैं हर दिन अपने खेत-मेंड़, खलिहानों में रेणु को जीता हूँ…
गेंहू और धान की पकती हुई बालियों में, गाढ़े होते हुए दूध की तरह…अमराई में-पुरवाई में…गमकते हुए महुए के गाछ पर कूकती हुई कोयल की कूक की तरह…और आने वाली कई-कई सदियां इसी तरह रेणु को जीती रहेंगी।

