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राजनीति

खिलाड़िनों का यौन शोषणः दिल्ली ऊंचा सुनती है

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

हिंदी का मशहूर नाटक है दिल्ली ऊंचा सुनती है. महिला पहलवानों के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है. सरकार ऊंचा सुन रही है, ओलंपिक संघ ऊंचा सुन रहा है, खेल मंत्रालय ऊंचा सुन रहा है, खिलाड़ियों के साथ फोटो खिंचवाने वाले प्रधानमंत्री ऊंचा सुन रहे हैं और दिल्ली पुलिस तो ऊंचा नहीं बहुत ऊंचा सुन रही है. सारा खेल एक बाहुबलि सांसद और कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बचाने के लिए हो रहा है. सात महिला पहलवानों ने सिंह के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया है, इनमें एक नाबालिग भी है. पुलिस को उन्होंने बाजाब्ता शिकायत की है लेकिन पुलिस ने अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की है. मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है और पुलिस ने दलील दी है कि जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज की जाएगी. लेकिन देश में प्रावधान तो यह भी है कि ऑनलाइन एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है. लेकिन पुलिस टालमटोल कर रही है. वह ऊंचा सुन रही है. सामाजिक कार्यकर्ता बीस साल की दिशा को गिरफ्तार करने में तत्परता दिखाने वाली पुलिस महिला पहलवानों के आवेदन पर एफआईआर दर्ज करने में अड़चने पैदा कर रही है तो इसका मतलब साफ है कि बृजभूषण शरण सिंह की पहुंच ऊंची है, सरकार में रुतबा है और उन पर हाथ डालने से पुलिस को परहेज है क्योंकि दिल्ली ऊंचा सुनती है. दिलचस्प यह है कि ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी ऊषा हैं उन्होंने महिला पहलवानों के प्रदर्शन पर सवाल खड़ा कर इसे अनुशासनहीनता करार दिया है. पीटी ऊषा और मुक्केबाज मैरीकॉम इन आरोपों की जांच के लिए बनी समिति में हैं लेकिन दोनों का व्यवहार अब सियासतदानों की तरह हो गया है और वे खिलाड़ियों के साथ नहीं बल्कि सरकार और आरोपी सांसद के सात खड़ी दिखाई दे रहीं हैं.

 

जंतर मंतर पर पहलवानों का धरना प्रदर्शन जारी है. साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया, विनेश फोगाट, संगीता फोगाट और दूसरे नामचीं पहलवान और कोच धरना स्थल पर पहुंच कर महिला पहलवानों को समर्थन दे रहे हैं लकिन सरकार कानों में तेल डाले हुए हैं. लेकिन पहलवान भी इस बार आरपार करने की ठान चुके हैं. वैसे भी पीटी ऊषा और मैरीकॉम की अगुआई में गठित सात सदस्यीय समिति की रिपोर्ट को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और सरकार ने अब नई समिति गठित करने का एलान कर पहलवानों को फिर से लॉलीपाप थमाने की कोशिश की है. यह समिति 45 दिनों में अपनी रिपोर्ट देगी. यह समिति भारतीय ओलंपिक संघ की देख रेख़ में गठित की जाएगी. यानी समिति-समिति का खेल महिला पहलवानों के साथ खेला जा रहा है और जिन खिलाड़ियों की इज्जत पर एक रसूखदार नेता ने हाथ डाला है वह दूर कहीं खड़ा ठठा कर हंस रहा होगा और महिला पहलवानों का मखौल उड़ा रहा होगा.

 

हालांकि यह भी सही है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं है. वह मामले को लटका रही है क्योंकि आरोप भाजपा के दबंग सांसद पर है. सवाल यह है कि एक जांच समिति तीन महीने बीत जाने के बाद भी अपनी रिपोर्ट तैयार नहीं कर पाई तो दूसरी से क्या उम्मीद की जा सकती है? यह सही है कि पीटी उषा और मैरीकॉम से बेहतर की उम्मीद की जा रही थी लेकिन उन्होंने भी सरकार और व्यवस्था के सामने समर्पण कर डाला और वे खिलाड़ियों के हितों की अनदेखी कर सरकार की भाषा बोल रहीं हैं. यह भी सही है कि दोनों ही भारतीय खेलों की सर्वश्रेष्ठ और सर्वमान्य राजदूत हैं. उनकी खेल उपलब्धियां से भला कौन इनकार कर सकता है लेकिन महिला पहलवानों के पक्ष में जिस मुखरता के साथ उन्हें बोलना चाहिए था वे नहीं बोल रहीं हैं. हालांकि इस मामले में पूरा खेल जगत ही एक तरह से खामोश तमाशाई बना बृजभूषण शरण सिंह की हिमायत करता दिख रहा है.

ब्रज भूषण शरण के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में पुलिस की आनाकानी के बाद पहलवानों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. पहलवान फेडरेशन अध्यक्ष पर कार्यवाही चाहते हैं. पहलवानों के अनुसार उनके सब्र का बांध टूट चुका है. वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं ताकि भविष्य में फिर कोई अधिकारी खुद को खेल से बड़ा समझने की भूल न करे और चैंपियन महिलाओं का शोषण न करे.

भारत के दिग्गज कुश्ती खिलाड़ियों ने जनवरी में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर महिला खिलाड़ियों के साथ यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे. अपने आरोपों के समर्थन में इन खिलाड़ियों ने तब भी जंतर-मंतर पर धरना भी दिया था. खिलाड़ियों को मामले की जांच का भरोसा दिलाया गया. एक कमेटी भी बनाई गई. तब यह कहा गया था कि कमेटी एक महीने में रिपर्ट दे देगी. लेकिन महीने बीत गए. रिपोर्ट नहीं आई तो पहलवानों ने फिर से प्रदर्शन की राह पकड़ी. खेलों में यौन उत्पीड़न हर दौर में चरम पर रहा है. लेकिन अब यह और बढ़ गया है. करियर और सुविधाओं के नाम पर अब यह ज्यादा होने लगा है. इस तरह की घटनाएं बढ़ेंगी तो जाहिर है कि फिर किसी न किसी को तो इसके खिलाफ सामने आना ही होगा. विनेश और उनके साथियों ने ने बड़ी पहल की है. पुलिस की कार्यशैली सवालों में है लेकिन उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट पर है।

(लेखक राष्ट्रीय लोक जनता दल के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता हैं।लेख उनके सोशल मीडिया अकाउंट फेसबुक से लिया गया है।)

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