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कुछ याद उन्हें भी कर लो जो…

आज  10 मई के दिन भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम की वर्षगांठ पर देश 1857 के शहीदों की याद कर रहा है। उनमें ज्यादातर उस दौर के राजे-रजवाड़े और सामंत थे जिनके सामने अपने छोटे-बड़े राज्य को अंग्रेजों से बचाने की भी चुनौती थी। स्वाधीनता संग्राम के विस्मृत नायकों में पीर अली खां जैसे कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके पास न तो कोई रियासत थी, न कोई संपति। उनके आत्म बलिदान के पीछे देश के लिए मर मिटने के जज्बे के सिवा कुछ और नहीं था। पीर अली का जन्म 1820 में आजमगढ़ के एक गांव मुहम्मदपुर में हुआ था। किशोरावस्था में वे घर से भाग कर पटना आ गए थे जहां एक जमींदार मीर अब्दुल्लाह ने उनकी परवरिश की। आजीविका के लिए उन्होंने नवाब साहब की मदद से किताबों की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। वह दुकान धीरे-धीरे प्रदेश के क्रांतिकारियों के अड्डे में तब्दील होती चली गई जहां देश भर से क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर बेचीं जाने लगी। पीर अली ने देश की आज़ादी की मुहिम में अपने हिस्से का योगदान देना अपने जीवन का मकसद बना लिया था। समय के साथ उनका दिल्ली के प्रमुख क्रांतिकारी अजीमुल्लाह खान से संपर्क बना। 1857 की क्रांति के वक़्त पीर अली ने बिहार के कोने-कोने में घूमकर देशभक्ति और क्रांति का जज्बा रखने वाले सैकड़ों युवाओं को संगठित कर लिया।

 

फिर वह दिन भी आया जिसके लिए पीर अली के नेतृत्व में आजादी के सैकड़ों दीवाने एक अरसे से तैयारी कर रहे थे। पूर्व योजना के अनुसार 3 जुलाई, 1857 को पीर अली के घर पर दो सौ से ज्यादा हथियारबंद युवा इकट्‌ठे हुए। देश की आजादी के लिए कुर्बानी की कसमें खाने के बाद पीर अली की अगुवाई में उन्होंने पटना के गुलज़ार बाग स्थित अंग्रेजों के प्रशासनिक भवन को घेर लिया। यह वही भवन था जहां से प्रदेश की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी और उनपर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार होती थी। वहाँ तैनात डॉ. लॉयल ने क्रांतिकारियों की उग्र भीड़ पर गोली चलवा दी। अंग्रेजी सिपाहियों की फायरिंग का जवाब क्रांतिकारी युवाओं की टोली ने भी फायरिंग से दिया। इस दोतरफा गोलीबारी में डॉ. लॉयल और कुछ सिपाहियों के अलावा कई क्रांतिकारी युवा मौके पर शहीद हुए और दर्जनों दूसरे घायल होकर अस्पताल पहुंच गए। पीर अली और उनके कुछ साथी चौतरफा फायरिंग के बीच घटना-स्थल से बच निकलने में सफल हुए।

 

 

इस हमले के बाद पटना में अंग्रेजों का जो दमन-चक्र चला, वह भयावह था। पुलिस द्वारा संदेह के आधार पर हजारों लोगों, खासकर मुसलमानो के घरों में घुसकर सैकड़ों निर्दोष लोगों की गिरफ्तारियां की गईं। कुछ लोगों को झूठा मुठभेड़ दिखाकर गोली मार दी गई। बहुत सारे लोगों के घर तोड़ डाले गए। अंततः 5 जुलाई, 1857 को पीर अली और उनके चौदह साथियों को बग़ावत के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पीर अली को असहनीय यातनाएं दी गईं। पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने उनसे कहा कि अगर वे देश भर के अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम बता दें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है। पीर अली ने उनका प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा–‘जिंदगी में कई ऐसे मौक़े आते हैं जब जान बचाना ज़रूरी होता है। कई ऐसे मौक़े भी आते हैं जब जान देना जरूरी हो जाता है। यह वक़्त जान देने का है।’ अंग्रेजी हुकूमत ने दिखावे के ट्रायल के बाद 7 जुलाई, 1857 को पीर अली को उनके साथियों के साथ बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया। फांसी के फंदे पर झूलने के पहले पीर अली के आखिरी शब्द थे – ‘तुम हमें फांसी पर लटका सकते हो, लेकिन हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मरूंगा तो मेरे खून से लाखों बहादुर पैदा होंगे जो एक दिन तुम्हारे ज़ुल्म का खात्मा कर देंगे।’

 

 

देश की आजादी के लिए प्राण देने वाले शहीद पीर अली खां इतिहास के पन्नों से आज भी अनुपस्थित हैं। इतिहास लिखने वालों के अपने पूर्वग्रह होते हैं। अभी उनके नाम पर पटना में एक मोहल्ला पीरबहोर गुलज़ार है। कुछ साल पूर्व बिहार सरकार ने उनके नाम पर गांधी मैदान के पास एक छोटा-सा पार्क बनवाया, शहर को हवाई अड्डे से जोड़ने वाली एक सड़क को ‘पीर अली खां रोड’ नाम दिया और 7 जुलाई को उनके शहादत दिवस पर समारोहों के आयोजन का सिलसिला शुरू कराया। दुख यह देखकर होता है कि देश ही नहीं, पटना की आम जनता को भी कम ही पता है कि पीर अली हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक नायक थे या मुसलमानों के कोई सियासी नेता !

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