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विविध

जाती नहीं सुबह की सी चाय की तलब!

••• पंखुरी सिन्ह

 

सुबह की चाय का वक़्त बीत जाता है
सुबह की चाय का स्वाद नहीं जाता!
जाती नहीं सुबह की सी चाय की तलब!
चाय पी जा सकती है, दिन में कई बार!
मुमकिन है आप कहें, जवाब नहीं शाम
की चाय का!दोपहर की चाय का मज़ा है
अपना! कहते हैं पीने वाले चाय! कभी भी
पी ली जाती है चाय! दो लेक्चर के
बीच, कॉन्फरेंस हो तो दिन में चार
बार पेश हो जाती है चाय! किसी की
नहीं होती इस किस्म की इतनी बार
पेशी, जैसे पेश हो जाती है चाय!
अखबार के दफ्तर में, पत्राचार के
टावर में, कहाँ नहीं चलती चाय!
दोस्त इकट्ठा होते हैं चाय की टपरी
पर! कुछ भी नहीं बिकता जैसे
बिकती है चाय! अकेलेपन की दोस्त
दोस्तों की हमदम, चाय पी जाती है
हरदम! सिर दर्द में चाय, थकन में चाय!
मैं भी हूँ चहेडी नम्बर एक!
लेकिन, सुबह की चाय का वक़्त बीत गया
सुबह की चाय का स्वाद, अब मिलेगा
अगली सुबह ही!

(वर्ल्ड टी डे के मौके पर लिखी गई कविता)

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