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राजनीति

पूर्वी चंपारण लोकसभा चुनाव:जातीय समीकरण के हिसाब से एनडीए का पलड़ा भारी

मेराज एम एन

कहा जाता है कि बिहार में चुनाव हो और जातिगत समीकरण पर बात ना हो ऐसा नामुमकिन है। हालांकि यह सिर्फ बिहार की ही नहीं अपितु पूरे भारत विशेष कर हिंदी पट्टी के लिए भी विशेष महत्व रखती है।। यानी जातिगत समीकरण के बिना हिंदी पट्टी की राजनीतिक कहानी पूरी नहीं हो सकती है। अब जबकि लोकसभा चुनाव 2024 का समय करीब आ रहा है ऐसे में राजनीतिक पार्टियां भी अंदरखाने जातिगत समीकरणों के हिसाब से अपनी अपनी पोजीशन चुस्त दुरुस्त करने में व्यस्त हो गई हैं।

जातीय समीकरण के हिसाब से बिहार की लोकसभा सीटों में पूर्वी चंपारण लोकसभा सीट की क्या स्थिति है इस पर बात करें तो यहां यादव,मुस्लिम, कुशवाहा,वैश्य,भूमिहार और राजपूत वोट जीत हार के फैसले में निर्णायक भूमिका में रहे हैं। इस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में करीब ढाई लाख वोट भूमिहारों का है।यानी भूमिहार वोट बैंक इस लोक सभा क्षेत्र की राजनीति को साधने के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। शायद यही वजह है की आज के बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को इस लोकसभा सीट पर एक बार कामयाबी हासिल हो चुकी है। अखिलेश प्रसाद सिंह को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी यादव,मुस्लिम,कुशवाहा समेत अपने स्वजातीय वोट बैंक भूमिहारों का साथ मिलने का पूरा भरोसा था इसीलिए उन्होंने वहां से अपने बेटे आकाश कुमार सिंह को तब की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव मैदान में उतारा था हालांकि आकाश कुमार सिंह जीत हासिल नहीं कर सके। उन्हें राधा मोहन सिंह ने भारी वोटो से पराजित किया।

राधा मोहन सिंह इस लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद चुने गए हैं। राधा मोहन सिंह राजपूत बिरादरी से आते हैं और इस लोकसभा क्षेत्र में राजपूतों का वोट लगभग एक लाख पैंसठ हजार है जो भाजपा का परंपरागत वोट बैंक समझा जाता है।चार लाख के करीब वैश्य मतदाता भी हैं जो बीजेपी के पक्ष में वोट देते आए हैं।इलाके मे कुशवाहों का वोट करीब सवा दो लाख है और यही वजह थी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य अखिलेश प्रसाद सिंह ने अपने बेटे आकाश कुमार सिंह को उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा से उम्मीदवार बनाया था। उन्हें उम्मीद थी कि मुस्लिम यादव के साथ-साथ उपेंद्र कुशवाहा के कुशवाहा समाज का वोट अगर आकाश कुमार सिंह को मिल जाता है तो जीत पक्की है। हालांकि चुनावी नतीजे से ये बात साफ हो गई कि कुशवाहा समाज ने उपेंद्र कुशवाहा पर विश्वास न करके भाजपा के पक्ष में मतदान किया और राधामोहन सिंह को भारी बहुमत से चुनाव में कामयाबी मिली।कुशवाहा अपने  समुदाय का वोट एकजुट रखने में नाकाम रहे।2014 के चुनाव में भी इस समुदाय का वोट बीजेपी को मिला था।

बात अगर पूर्वी चंपारण लोकसभा क्षेत्र में महागठबंधन के परंपरागत वोट बैंक अर्थात यादव और मुस्लिम वोटो की करें तो अच्छी तादाद में यादव और मुस्लिम वोट है। पूर्वी चंपारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में यादव और मुस्लिम वोट कुल मिलाकर चार लाख से ज्यादा हैं जिन्हें गठबंधन के खेमे का बताया जाता है। इस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में जीत हार का फैसला करने में यह वोट बैंक भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। क्योंकि अगर यादव और मुस्लिम समाज का एकमुश्त वोट किसी पार्टी को जाता है तो उसके कामयाब होने के चांस बढ़ जाते हैं।

निष्कर्ष ये कि जातीय गणना के बाद बिहार की राजनीति में आए बदलाव के मद्देनजर आगामी लोकसभा चुनाव 2024 जातीय समीकरण के एक नए आयाम के साथ चुनावी मैदान में होगा। ऐसी स्थिति में पूर्वी चंपारण लोकसभा क्षेत्र में भाजपा बनाम महागठबंधन की लड़ाई में कौन किसको मात देता है यह देखना बहुत दिलचस्प होगा।

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