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राजनीति

लोकतंत्र के महापर्व पर पश्चिम की उदासीनता

ताक़तवर देशों की पूरी निगाहें भारतीय चुनाव परिणाम पर है. मगर,पर्यवेक्षक भेजे नहीं. किन वजहों से ऐसा हुआ? 23 देशों के 75 प्रतिनिधियों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित कर महाराष्ट्र, कर्णाटक, गोवा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात भेजा गया है. 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेश वाले इस विराट देश में केवल छह राज्यों में विदेशी पर्यवेक्षक चुनाव का मुआयना करते हैं, तो सवाल करना बनता है न ! 

 

 

•पुष्परंजन

195 देश हैं दुनियाभर में. इनमें से दो देश मान्यता का इंतज़ार कर रहे हैं: होली सी, और फिलस्तीन. केवल 23 देशों के पर्यवेक्षकों का दुनिया से सबसे बड़े लोकतंत्र का चुनाव देखने आना सचमुच चिंता का विषय है. भारतीय निर्वाचन आयोग के अधिकारी बताते हैं, “जर्मनी, अमेरिका तक ने आने से मना कर दिया.” तो आये कौन-कौन से देश? भूटान, मंगोलिया, मेडागास्कर, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, क्रिगिज़ रिपब्लिक, रूस, माल्दोवा, ट्यूनीशिया, सिसली, कम्बोडिया, नेपाल, फिलीपींस, श्रीलंका, ज़िम्बाब्वे, बांग्लादेश, कज़ाकस्तान, जॉर्जिया, चिली, उज़्बेकिस्तान, मालदीव, पापुआ न्यूगिनी और नामीबिया. कुल जमा 23 देशों के 75 विज़िटर्स.

 

चुनाव आयोग के जॉइंट डाइरेक्टरअनुज चंडक ने यह जानकारी साझा करते हुए बाद में जोड़ा था कि “मेंबर्स ऑफ़ इंटरनैशनल फाउंडेशन फॉर एलेक्ट्रोरल सिस्टम” के प्रतिनिधि और शायद इज़राइल और भूटान की मिडिया टीमें भी आएं. 23 देशों के 75 प्रतिनिधियों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित कर महाराष्ट्र, कर्णाटक, गोवा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात भेजा गया है. 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेश वाले इस विराट देश में केवल छह राज्यों में विदेशी पर्यवेक्षक चुनाव का मुआयना करते हैं, तो सवाल करना बनता है न !

 

पिछले महीने ही अमेरिकी विदेश विभाग ने स्पष्ट कर दिया था कि हमारा देश भारत में कोई चुनाव पर्यवेक्षक नहीं भेज रहा है, लेकिन सत्ता में भागीदारों के साथ अपने सहयोग को गहरा और मजबूत करने के लिए उत्सुक है। जर्मनी ने भी अमेरिकी शैली में ही अपनी दूरी बना ली. भारत में जर्मन राजदूत फिलिप एकरमन्न ने 16 अप्रैल को बयान दिया था कि जर्मनी आने वाले दिनों में भारत में शुरू होने वाले दुनिया के सबसे बड़े चुनावों को ” प्रशंसनीय दृष्टि के साथ” देख रहा है। जर्मन दूत ने कहा कि जब देश अपनी अगली सरकार के लिए मतदान करेगा तो दुनिया भर में भारत की छवि अधिक देखी जाएगी। यह लोकतंत्र का उत्सव है, हम इसे यूरोपीय नुक्ते-नज़र से ही देखेंगे. अर्थात, “जैसा मतदान – वैसा अनुमान” वाली कूटनीति को आगे बढ़ाना जर्मनी ने पसंद किया. लेकिन, जर्मनी की राह पर शायद फ़्रांस न चले.

 

दिलचस्प है कि भारतीय चुनाव का अवलोकन करने के वास्ते न तो 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ का कोई प्रतिनिधि आया, न ही 57 सदस्यीय आर्गेनाइजेशन ऑफ़ द इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) ने किसी को भेजना उचित समझा. जी-20 से भी किसी पर्यवेक्षक की मौजूदगी भारत में हो रहे आम चुनाव में दिखी. भारत के अंदरूनी मामलों में गहरी नज़र और दिलचस्पी सारे विकसित व विकासशील देशों की है. नहीं होती, तो संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ऐसा नहीं कहते, “हमें बहुत उम्मीद है कि भारतीय मतदान प्रक्रिया में सभी के राजनीतिक और नागरिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। इस देश में हर कोई स्वतंत्र और निष्पक्ष माहौल में मतदान करने में सक्षम है।” स्टीफन दुजारिक केजरीवाल की गिरफ्तारी और कांग्रेस पार्टी के बैंक खातों को जब्त करने के मद्देनजर भारत में “राजनीतिक अशांति” पर एक सवाल का जवाब देते हुए यह बात कह रहे थे. अपने प्रवक्ता से इतनी टिप्पणी करवाने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने किसी प्रतिनिधि को भारतीय चुनाव देखने के वास्ते क्यों नहीं भेजा? यह जानना ज़रूरी तो है.

 

अरविन्द केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर जिस तरह प्रतिक्रिया अमेरिका और जर्मनी ने दी थी, उससे एक बारी तो लगा था कि कूटनीतिक सम्बन्ध पटरी से उतर जायेंगे. दोनों देशों के दूतों को बुलाकर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ा प्रतिरोध व्यक्त किया था. बावजूद इसके, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा था, “हम दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कार्रवाई पर बारीकी से नज़र रखना जारी रखेंगे। हम कांग्रेस पार्टी के आरोपों से भी अवगत हैं कि टैक्स अफसरों ने उनके कुछ बैंक खातों को इस तरह से फ्रीज कर दिया है कि उनके लिए चुनावों में प्रभावी ढंग से प्रचार करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। और हम इनमें से प्रत्येक मुद्दे के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और समय पर कानूनी प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं.”

 

अब सवाल यह है कि परिणाम के बाद क्या दुनिया के तमाम विकसित देश इसे मानने को तैयार होंगे कि भारत में चुनाव निष्पक्ष और बिना किसी भेदभाव के संपन्न हुआ है? ठीक से देखा जाये तो जिन 23 देशों के प्रतिनिधि भारत आये, उनमें रूस और सेन्ट्रल एशिया के देश वही बोलेंगे जो मास्को का दृष्टिकोण होगा. मालदीव के पर्यवेक्षक क्या बोलते हैं, वह मुस्लिम देशों के लिए महत्वपूर्ण होगा. मालदीव इस समय “अनगाईडेड मिसाइल” है.

 

लेकिन इस पूरी कहानी में बीजेपी कार्यालय से पर्यवेक्षक के वास्ते न्योता भेजा जाना रोचक है. दरअसल, यह काम तो चुनाव आयोग का था. तो बीजेपी क्यों ख़ामख़्वाह? बीजेपी ने 25 से अधिक देशों की पोलिटिकल पार्टियों को निमंत्रण भेजा था। लेकिन अमेरिका से न तो डेमोक्रेट, और न ही रिपब्लिकंस ने इस न्योते को स्वीकार किया. भाजपा के सूत्रों ने बताया कि 25 देशों की 13 पार्टियों ने कन्फर्म किया था कि हम भारत दौरे पर आ रहे हैं. तो क्या ऐसी ही छूट कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के सहयोगियों को भारत सरकार ने दी थी? इस सवाल का उत्तर चुनाव आयोग ने नहीं दिया है.

 

बात जब विदेशी निगाहों की हो, तो पाकिस्तान भी ज़ेरे बहस में आ ही जाता है. सबको पता है कि पीएम मोदी और सत्ता पक्ष के दूसरे नेता किस वोट बैंक को पोलराइज करने के वास्ते पाकिस्तान को विपक्ष से चिपकाते हैं. पाकिस्तान में एक शख्स हैं फवाद चौधरी. सूचना प्रसारण मंत्री थे, विवाद के घेरे में रहे. विगत दो दिनों से दोनों देशों में जमकर ट्रोल हो रहे हैं. अरविंद केजरीवाल ने 25 मई को परिवार संग वोट किया. फवाद ने उसकी तस्वीर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर की. फवाद का खेल समझ चुके केजरीवाल ने कहा, ”चौधरी साहिब, मैं और मेरे देश के लोग अपने मसलों को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं. आपके ट्वीट की जरूरत नहीं है. इस वक्त पाकिस्तान के हालात बहुत खराब हैं. आप अपने देश को संभालिये.”

 

लेकिन पीएम मोदी ने मणिशंकर अय्यर की टिप्पणियों से लेकर फवाद के ट्वीट तक से जैसा खेला, उसे बीजेपी नेतृत्व की मारक क्षमता ही मानिये. यह चुनाव नहीं, रण है. प्रतिपक्ष के नेता यदि व्यूह रचना का अवसर सत्ता पक्ष को जाने-अनजाने देते हैं, तो यह उनकी कमज़ोरी है. द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में कामरान युसूफ़ लिखते हैं, ”ये सब देखकर लगता है कि नेता किस तरह से भारत या पाकिस्तान में लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. फ़वाद चौधरी के ट्वीट्स को पाकिस्तान में कोई पूछता भी नहीं.”

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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