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राजनीति

नीतीश कुमार मुश्किल में फंस चुके हैं,निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

मेराज नूरी 

बिहार में सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी ने 12 फरवरी को हुए विश्वास मत प्रस्ताव में जीत हासिल कर ली है। नीतीश सरकार ने आज भले ही विश्वास का मथुरा हासिल कर लिया है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई है। नीतीश कुमार सरकार की मुश्किल कुछ देर के लिए भले ही हल हो गई हो लेकिन आने वाले लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही बिहार की नीतीश कुमार सरकार पर खतरे के फिर से मंडलाने लगेंगे। अगर उस वक्त जनता दल यूनाइटेड के असंतुष्ट और महत्वाकांक्षी विधायकों ने कुछ भी खेला किया तो नीतीश कुमार को अपनी सरकार बचा पाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में शामिल होने के बाद लोकसभा का सीटों का जो गणित है वह नीतीश कुमार को परेशानी में डाल सकता है।

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दरअसल इस वक्त भारतीय जनता पार्टी के 17 सांसद है तो वहीं जनता दल यूनाइटेड के सांसदों की तादाद 16 है। जाहिर है इन सभी सांसदों को फिर से टिकट मिलने की न सिर्फ उम्मीद होगी बल्कि वह किसी भी कीमत पर अपना टिकट गँवाना नहीं चाहेंगे। कई सेटिंग एमपी को टिकट मिलना भी तय है। वह चाहे भारतीय जनता पार्टी में हो या जनता दल यूनाइटेड में सभी सांसद कतई नहीं चाहेंगे कि उनका टिकट कटे या फिर उनकी जगह गठबंधन किसी दूसरे व्यक्ति को उम्मीदवार बनाएं।

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आंकड़ा ये है कि 2019 में एनडीए ने 40 में से 39 सीटों पर जीत दर्ज की थी, एक सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी।पिछली बार के लोकसभा चुनाव में जेडीयू, बीजेपी और लोजपा ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।इसमें जेडीयू के 16 प्रत्याशी विजयी हुए थे।लोजपा के छह प्रत्याशी चुनाव जीते थे। बाकी बाकी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की थी।

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नए राजनीतिक परिदृश्य में 12 फरवरी को हुए फ्लोर टेस्ट में नीतीश कुमार ने भले ही कामयाबी हासिल कर ली है लेकिन जैसे ही लोकसभा चुनाव का बिल्कुल बजेगा वैसे ही जनता दल यूनाइटेड के कई महत्वाकांक्षी विधायकों की महत्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगेगी। कई तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अंदर खाने ही सही लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर ली है। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें एनडीए गठबंधन की ओर से लोकसभा चुनाव का टिकट नहीं मिलता है तो हो सकता है कि वैसे नेतागण उस वक्त पलटी मारने से बाज नहीं आए।

 

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ऐसा इसलिए भी क्योंकि मौजूदा वक्त में बिहार विधान परिषद के सभापति देवेश चंद्र ठाकुर ने सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र से किस्मत आजमाने का लगभग तय कर लिया है और उन्हें नीतीश कुमार की तरफ से हरी झंडी भी मिल गई है। देवेश चंद्र ठाकुर की उम्मीदवारी पर ठप्पा लगते ही सीतामढ़ी के सुरसंड से विधायक दिलीप राय ने बगियाना तेवर अपना लिया था। इससे पहले दिलीप राय ने पटना में ही महागठबंधन के कई असंतुष्ट पूर्व सांसद पूर्व विधायक के साथ मीटिंग की थी और देवेश चंद्र ठाकुर की उम्मीदवारी रद्द करने की मांग की थी। दिलीप राय की यही नाराजगी 12 फरवरी तक भी कायम थी जो देखने को भी मिली और दिलीप राय फ्लोर टेस्ट से गायब रहे।

 

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राजनीतिक विश्लेषण को का मानना है कि न सिर्फ जनता दल यूनाइटेड बल्कि भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ राजद और कांग्रेस के भी कई विधायक ऐसे हैं जो लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं। ऐसे विधायकों का मानना है कि ज्यादा ही बेहतर यह हो कि उनके अपने ही दल से लोकसभा चुनाव का टिकट मिल जाए लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो यह विधायक गण किसी दूसरी पार्टी का रुख नहीं करेंगे इस बात की गारंटी भी कोई नहीं ले सकता है।

 

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ऐसी स्थिति में अगर जनता दल यूनाइटेड ने अपने किसी भी संसद का टिकट काट दिया तो हो सकता है कि वह किसी दूसरी पार्टी का रुख करें। वैसे लोगों के दूसरी पार्टी में शामिल होकर लोकसभा चुनाव लड़ने से यूं तो बिहार की नीतीश कुमार सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है लेकिन अगर जनता दल यूनाइटेड या भारतीय जनता पार्टी के किसी विधायक ने लोकसभा चुनाव लड़ने की आकांक्षा में किसी दूसरी पार्टी का खास तौर से महागठबंधन की पार्टी का रुख किया तो ऐसी स्थिति में न सिर्फ यह की विधानसभा में दलीय स्थिति बदल जाएगी बल्कि नीतीश कुमार सरकार को कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ सकता है।

 

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अब अगर विधायकों के पाला बदलकर लोकसभा चुनाव का टिकट हासिल करने की संभावनाओं पर बात करें तो फिलहाल एनडीए के मुकाबले इंडिया गठबंधन में संभावनाएं अधिक हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आने वाले लोकसभा चुनाव में टिकट की संख्या के नाम पर महागठबंधन के पास 39 सीटें हैं। अगर उन 39 सीटों में से महागठबंधन के शीर्ष नेतृत्व में 10-20 टिकट भी सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड, भारतीय जनता पार्टी और हिंदुस्तानी एवं मोर्चा के विधायकों के बीच बांट दिए तो ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार सरकार को गिरने से कोई नहीं बचा सकता है। जबकि एनडीए गठबंधन में सीटों की गुंजाइश बहुत ही कम है क्योंकि एनडीए गठबंधन में पहले से ही 39 सीटों पर स्टिंग एमपी है और उन 39 सांसदों में से 90% फिर से उम्मीदवार बनाए जाएंगे। हो सकता है कि 2–4 सांसदों का टिकट काट दिया जाए लेकिन मौजूदा हालात के मुताबिक ज्यादातर सांसद का टिकट लगभग कंफर्म है।

 

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कुल मिलाकर नीतीश कुमार के द्वारा महागठबंधन से अलग होकर एनडीए गठबंधन के साथ मिलकर नई सरकार बनाने और फिर बहुमत का वोट हासिल करने के बाद भी हालात कम चैलेंजिंग नहीं हैं। भले ही नीतीश कुमार ने आज विश्वास मत हासिल कर लिया हो लेकिन लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही नीतीश कुमार सरकार के सामने एक बार फिर से यही स्थिति होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के विधायक क्या रुख तैयार करते हैं और पार्टी को तरजीह देते हैं या फिर अपनी महत्वाकांक्षा को। लेकिन इतना तो तय है कि अगर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के विधायकों ने अपनी महत्वाकांक्षा को तरजीह दी तो यकीनन बिहार की नीतीश कुमार सरकार को फिर से इन्हीं सब चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यानी यह कहा जा सकता है कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार 2024 में एनडीए के साथ सरकार बनाकर मुश्किल में फंस गए हैं और इससे निकलना उनके लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा दिखाई पड़ता है।

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