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राजनीति

हिंदुत्व से लोकप्रियता और हिंदुत्व से ही अलोकप्रियता

हिंदुत्व के सहारे भाजपा ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की थी। 2019 की प्रचंड जीत से उत्साहित होकर ही भाजपा ने राममंदिर, सीएए जैसे गड़े हिंदुत्ववादी मुद्दें को उठाया और इस चुनाव से पहले आनन – फानन में इस पर काम किया। करीब 80 फीसदी हिन्दू आबादी वाले इस देश में हिंदुत्व से भाजपा की उम्मीदें बढ़ती ही गई। यही कारण है कि 2024 के आम चुनाव में भाजपा ने 400 पार का नारा दिया।

 

हिंदुत्व और इससे मिल रही लगातार सफलता के कारण भाजपा इस चुनाव में ओवर कंफिडेंस में दिखीं। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने मुस्लिम विरोधी बयान दिए। विकास से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के बजाए राममंदिर, अनुच्छेद 370 और सीएए, मुस्लिम आरक्षण जैसे मुद्दों को उन्होंने उठाया। भाजपा ने पीएम मोदी को हिंदुत्व का चेहरा बनाकर यह चुनाव लड़ा। उसे उम्मीद थी कि हिंदुत्व के नाम पर चुनाव लड़ने से वह बड़ी जीत हासिल कर सकती है। लेकिन नतीजा सबके सामने है। भाजपा 400 पार तो दूर अकेले अपने दम पर बहुमत भी हासिल नहीं कर सकी है। सरकार बनाने के लिए अब वह अपने सहयोगी पार्टियों पर निर्भर हो गई है। भाजपा की जीत को लेकर आकलन करने में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर और तमाम एक्जिट गलत साबित हुए हैं।प्रश्न उठता है कि आखिर यह कैसे मुमकिन हुआ? यह जानने के लिए हमने बिहार के अलग-अलग जगहों के कई मतदाताओं से बातचीत की। बातचीत से पता चला कि भाजपा की अक्रामक हिंदुत्व की रणनीति से जहां दलित और पिछड़ें वर्ग के मतदाताओं में पुरानी हिंदू जाति और सामाजिक व्यवस्था का भय है, वहीं सवर्ण मतदाता भी अब किसी संप्रदायिक हिंसा के चपेट में नहीं आना चाहते हैं। प्रगतिशील सोच वाली महिलाएं अब हिंदुवादी समाज को नकारती नजर आई।

 

हालांकि बिहार में इंडिया गठबंधन को बड़ी जीत नहीं मिल सकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह है यहां विपक्ष का कमजोर होना है। हाल के दिनों में कई सवर्ण और वैश्य मतदाता यह कहते हुए मिले कि हम राजद को वोट देना पसंद नहीं करते हैं इसलिए भाजपा को वोट देना हमारी मजबूरी है।यूपी में राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं की लोकप्रियता की बदौलत इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीती हैं। कई जगह हार का अंतर भी काफी कम है। वाराणसी सीट पर जहां से प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव लड़ा है वहां जीत का अंतर मात्र 1.52 लाख रह गया है जो कि 2019 के चुनाव में 4.71 लाख था।

 

वहीं बिहार की भी कई सीटों पर मामूली अंतर से एनडीए को जीत मिली है। वोटिंग प्रतिशत के आधार पर देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले बिहार में अकेले भाजपा को लगभग 4 फीसदी वोट का नुक्सान हुआ है। वहीं इसके सहयोगी जदयू को 3.7 फीसदी और लोजपा को 1.5 के करीब वोटों का नुकसान हुआ है।2014 और 2019 में भाजपा का हिंदुत्व 2024 के मुकाबले अलग था। 2014 में हिंदुत्व के साथ विकास, महंगाई और काले धन जैसे मुद्दें ने भाजपा को जीत दिलाई। वहीं 2019 में पुलवामा हमले के बाद भाजपा ने हिंदुत्व के साथ राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा था।

 

पिछली दोनों जीत से उत्साहित होकर भाजपा ने 2024 में अक्रामक हिंदुत्व की नीति अपनाई थी। 2024 के आम चुनाव से पहले आनन- फानन में राम मंदिर का निर्माण कर इसका उद्घाटन पिछले 22 जनवरी को किया गया। इसके जरिए भी भाजपा ने चुनावी फायदा लेने की कोशिश की थी। चुनाव से पहले मुस्लिम समाज के विरोध के बावजूद सीएए को लागू किया गया। 2019 में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उस पर अक्रामक नीतियां अपनाने का आरोप लगता रहा है। विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि भाजपा के इशारे पर विपक्ष के नेताओं को जांच एजेंसियों द्वारा परेशान किया जाता है। विपक्ष ने इसे भी इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बना कर भाजपा को खूब परेशान किया है।

 

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 में भाजपा को मनमुताबिक सफलता नहीं मिलने के बाद भी हिंदुत्व का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है।2014 और 2019 में जिन लोगों ने विकास, महंगाई कम होने और काले धन के वापस आने का सपना देखा था वे 2024 आते-आते निराश हो चुके हैं।हिंदुत्ववादी राजनीति ने न सिर्फ दलित और पिछड़ें वर्ग को भयभीत किया है कि बल्कि महिलाओं को भी भाजपा से पहले के मुकाबले दूर किया है। राजनैतिक हिंदुत्व ने भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाया है लेकिन अब इसे देश की जनता नकार रही है। जिस हिंदुत्व के मुद्दे से भाजपा को लोकप्रियता मिली थी अब यही मुद्दा भाजपा की अलोकप्रियता का कारण बन रहा है। देश की जनता अब अपने वास्तविक मुद्दों पर बात करना चाहती है। उसे हर दिन धर्म की राजनीति और राजनीति में धर्म का अत्यधिक प्रयोग पसंद नहीं आ रहा है।

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