Stray Dogs Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान कई अहम और सख्त टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर यह कैसे तय किया जा सकता है कि कौन सा कुत्ता काटने के मूड में है और कौन नहीं। अदालत ने साफ कहा कि जब सार्वजनिक सुरक्षा की बात आती है, तो केवल भावनाओं के आधार पर फैसले नहीं किए जा सकते। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कोर्ट ने कहा कि रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होती है और समस्या का समाधान वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि सभी आवारा कुत्तों को पकड़ना या शेल्टर में रखना न तो संभव है और न ही आर्थिक रूप से व्यवहार्य। उन्होंने कहा कि समस्या का मूल कारण मौजूदा कानूनों का ठीक से पालन न होना है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पशु कल्याण जरूरी है, लेकिन मानव सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पशु प्रेम का मतलब केवल एक विशेष जानवर तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी जीवों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।
गेटेड कम्युनिटी में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सुझाव दिया। अदालत ने कहा कि ऐसा कानूनी प्रावधान होना चाहिए, जिससे गेटेड सोसाइटी अपने यहां कुत्तों को लेकर मतदान के जरिए फैसला कर सके। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि 90 प्रतिशत निवासी इसे बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा मानते हैं और 10 प्रतिशत विरोध करते हैं, तो सामुदायिक निर्णय को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यहां तक कि कोर्ट ने टिप्पणी की कि “अगर कोई कल भैंस ले आए और कहे कि मुझे दूध चाहिए, तो क्या होगा?” सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पशु प्रेमियों को सड़कों पर नहीं, बल्कि शेल्टर में मौजूद कुत्तों की देखभाल और भोजन की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मामले की सुनवाई अगले दिन भी जारी रहेगी।

