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शिक्षा

व्यवस्था बच्चे के सपनों को कुचल देती है तो…

अब आज की ही बात है।मैं अपने रूम से निकल पर कुछ सामान लाने गया था।सड़क पर निकला तो देखता हूं कि ट्रैफिक रोक दिया गया है।एक तरफ गाड़ियों की लाइन लगी है दूसरी तरफ सन्नाटा।कारण! महामहिम राज्यपाल महोदय का काफिला गुजरने वाला था।15_20 मिनट ट्रैफिक रोक रखा गया।महामहिम गुजरे तब जाकर आम लोगों के लिए रास्ता खोला गया।अब अगर इसमें कोई परीक्षार्थी फंस गया हो,और उस कारण दो चार दस मिनट लेट परीक्षा केंद्र पहुंचे तो उनको परीक्षा से वंचित कर देना कहां का न्याय होगा।

 

 

• मेराज नूरी 

बिहार में बच्चे को केवल थोड़ी देर से पहुँचने पर परीक्षा से वंचित कर देना उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यह कथन आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक हो गया है, जब हाल ही में बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड (BSEB) की इंटरमीडिएट परीक्षाओं के दौरान सैकड़ों छात्र-छात्राओं को महज 2-10 मिनट की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं मिला। कई केंद्रों पर रोती-बिलखती लड़कियाँ गेट के बाहर खड़ी दिखीं, कुछ ने गुहार लगाई, तो कुछ ने गेट फांदने की कोशिश की। यह दृश्य न केवल हृदयविदारक है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की मानवीय संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल भी उठाता है।

 

परीक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? शिक्षा विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का सर्वसम्मत मत है कि बोर्ड परीक्षाएँ छात्र की योग्यता, ज्ञान और समझ का मूल्यांकन करने के लिए होती हैं, न कि उन्हें दंडित करने या उनके जीवन में बाधा डालने के लिए। यदि कोई छात्र वर्ष भर कड़ी मेहनत करता है, रात-दिन पढ़ाई करता है, और परीक्षा के दिन मात्र 5-10 मिनट की देरी के कारण पूरे पेपर से वंचित कर दिया जाता है, तो यह योग्यता की जाँच नहीं, बल्कि एक क्रूर सजा बन जाती है। बिहार बोर्ड के वर्तमान नियमों के अनुसार, परीक्षा शुरू होने से 30 मिनट पहले मुख्य गेट बंद कर दिया जाता है और उसके बाद किसी भी हाल में प्रवेश नहीं मिलता। पहली पाली (सुबह 9:30 बजे शुरू) के लिए गेट सुबह 9 बजे बंद हो जाता है, जबकि छात्रों को कम से कम एक घंटा पहले (8:30 बजे) पहुँचने की सलाह दी जाती है। यह नियम नकल रोकने और अनुशासन बनाए रखने के लिए बनाया गया है, लेकिन क्या यह इतना कठोर होना चाहिए कि बच्चे का पूरा साल बर्बाद हो जाए?

 

देरी के कारण अक्सर छात्र के नियंत्रण में नहीं होते। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल-कॉलेज दूर-दराज हैं, परिवहन व्यवस्था कमजोर है, सड़कें खराब हैं और ट्रैफिक जाम आम बात है, देरी होना स्वाभाविक है। रेलवे फाटक बंद रहना, बस या ट्रेन लेट होना, खराब मौसम, या अचानक स्वास्थ्य समस्या जैसी घटनाएँ किसी भी बच्चे के साथ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, हाल की परीक्षाओं में कई छात्राओं ने बताया कि रेलवे क्रॉसिंग बंद होने से वे 20-30 मिनट लेट हो गईं, लेकिन केंद्राधीक्षक ने सख्ती से प्रवेश नहीं दिया। क्या ऐसे में बच्चे को दोषी ठहराना उचित है? क्या शिक्षा विभाग को ऐसे अप्रत्याशित कारणों के लिए कोई न्यूनतम ग्रेस पीरियड (जैसे 10-15 मिनट) नहीं रखना चाहिए?

 

अब आज की ही बात है।मैं अपने रूम से निकल पर कुछ सामान लाने गया था।सड़क पर निकला तो देखता हूं कि ट्रैफिक रोक दिया गया है।एक तरफ गाड़ियों की लाइन लगी है दूसरी तरफ सन्नाटा।कारण! महामहिम राज्यपाल महोदय का काफिला गुजरने वाला था।15_20 मिनट ट्रैफिक रोक रखा गया।महामहिम गुजरे तब जाकर आम लोगों के लिए रास्ता खोला गया।अब अगर इसमें कोई परीक्षार्थी फंस गया हो,और उस कारण दो चार दस मिनट लेट परीक्षा केंद्र पहुंचे तो उनको परीक्षा से वंचित कर देना कहां का न्याय होगा।

 

एक परीक्षा छूटने का नुकसान केवल एक पेपर तक सीमित नहीं रहता; यह बच्चे के पूरे भविष्य पर गहरा असर डालता है। बिहार में अधिकांश छात्र सरकारी या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं, जहाँ एक साल का नुकसान आर्थिक और भावनात्मक दोनों स्तर पर भारी पड़ता है। यदि बच्चा 12वीं की परीक्षा से वंचित हो जाता है, तो उसे पूरे साल इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान उसका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है। वर्ष भर की तैयारी व्यर्थ चली जाती है और वह खुद को असफल समझने लगता है। मानसिक तनाव बढ़ता है। कई मामलों में डिप्रेशन, चिंता या आत्महत्या जैसी चरम स्थिति तक पहुँच जाते हैं। परिवार पर बोझ बढ़ता है। कोचिंग, किताबें, और एक अतिरिक्त साल की पढ़ाई का खर्च। यदि छात्र मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, तो उसकी उम्र और प्रयास सब प्रभावित होते हैं। गाँव-शहर में लोग ताने मारते हैं, जिससे बच्चे का मनोबल और कमजोर होता है।शिक्षा व्यवस्था का असली मकसद सुधार करना है, सजा देना नहीं।

 

इस सख्ती का एक पक्ष यह भी है कि यह नकल रोकने और समय की पाबंदी सिखाने के लिए है। लेकिन क्या सख्ती का यह रूप न्यायसंगत है? यदि कोई छात्र जानबूझकर लेट आता है, तो उसे दंड मिलना चाहिए, लेकिन अप्रत्याशित कारणों से लेट होने वाले निर्दोष बच्चों को भी उसी श्रेणी में रखना अन्याय है।

 

शिक्षा मानवीय मूल्यों पर टिकी होती है। यदि व्यवस्था बच्चे के सपनों को कुचल देती है, तो वह अपनी सार्थकता खो देती है। बिहार के लाखों छात्र-छात्राएँ गरीबी, संसाधनों की कमी और सामाजिक चुनौतियों से जूझते हुए भी पढ़ाई करते हैं। उनकी मेहनत को मात्र समय की देरी के कारण बर्बाद करना क्रूरता है।

 

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि परीक्षा से वंचित करना बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। बोर्ड को चाहिए कि वह नियमों में लचीलापन लाए, मानवीय दृष्टिकोण अपनाए और शिक्षा को सजा की बजाय अवसर का माध्यम बनाए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऐसे हृदयविदारक दृश्य जारी रहेंगे और कई मासूम सपने अधूरे रह जाएँगे।

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