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सूफ़ी संत ख़ातून और उनकी ख़ूबसूरत आँखें

फ़ैज़ाबाद शहर लखनऊ से पहले अवध की राजधानी था। फ़ैज़ाबाद को नवाब शुजाउद्दौला ने ऐसा करीने से संवारा कि उस दौर में फ़ैज़ाबाद इल्म-ओ-अदब का मरकज़ बन गया। उजड़ती दिल्ली से हर किस्म के फ़नकार और कलाकार फ़ैज़ाबाद में आकर बसने लगे। जंगल में शहर बस गया। नवाब ने फ़ैज़ाबाद में आलीशान इमारतें बनवाईं।शहर को परकोटे से बाँधा और हर दिशा में फाटक बनवाए। इन्हीं फाटकों के बीच बसा हुआ था शहर फ़ैज़ाबाद। तस्वीर में फ़ैज़ाबाद शहर का एक फाटक नज़र आ रहा है। फ़ैज़ाबाद में बहू बेग़म का मकबरा है,नवाब शुजाउद्दौला का मकबरा है और नवाब का महल आज भी मौजूद है।उस दौर की तमाम इमारतें भी हैं।नवाब ने फ़ैज़ाबाद में बाग़ लगवाये जिनमें मोतीबाग़ लालबाग़ आसफ़बाग़ और बुलंदबाग़ मशहूर हैं।लालबाग़ के हुस्न की वो शोहरत थी कि शहंशाह-ए-हिंदोस्तान शाह आलम जब इलाहाबाद से वापस जा रहे थे तो फ़ैज़ाबाद सिर्फ़ लालबाग़ देखने के लिए आए और यहाँ कुछ दिनों तक विश्राम किया।

 

 

दिल्ली की तरह ख़ुशपोशाक और ज़िंदादिल लोगों से भरा-पूरा शहर था फ़ैज़ाबाद।जहाँ शहर फ़ैज़ाबाद का पश्चिमी फाटक था उससे चार मील पहले मुमताज़नगर से ही बाज़ार शुरू हो जाती।कोई बाहरी शख़्स आता तो ये समझता कि वो फ़ैज़ाबाद शहर में आ गया है।दरख़्तों के नीचे गर्मागर्म कबाब,सालन और रोटियाँ पक रही हैं,सबीलें बंट रही हैं,शरबत तक्सीम हो रहा है,मिठाइयाँ-जलेबियाँ और फ़ालूदे बिक रहे हैं।चारों तरफ़ भीड़ ही भीड़।लोग सामानों पर टूटे पड़ते हैं।लेकिन जब कोई चार मील आगे चल लेता तो फ़ैज़ाबाद शहर का फाटक आया करता।इसी फाटक के भीतर फ़ैज़ाबाद नाम का शहर आबाद था।शहर के अंदर घुसने पर दिलचस्पियाँ ही दिलचस्पियाँ।कहीं तमाशे हो रहे हैं तो कहीं नाच हो रहा है।शहर दिल्ली से कई मायनों में कम नहीं था।फ़ौजी पल्टनें घूम रही हैं,नक्कारों की आवाज़ें आ रही हैं,वक़्त बताने के लिए नौबतें और घड़ियाल बज रहे हैं।घोड़े-हाथी-ऊंट समेत हर किस्म के जानवर मौजूद हैं।नवाब ख़ुद रोज़ फ़ैज़ाबाद शहर की जांच करने निकलते।नवाब ने मोहल्ले और बाज़ार आबाद करने की छूट दी थी लेकिन ये भी ख़्याल रखते कि कोई सड़क पर काबिज़ ना हो।उनके साथ चलने वाले फ़ौजी किसी दुकान या मकान को हद से बाहर सड़क पर देखते तो उतना हिस्सा तोड़कर हटा दिया करते।मतलब एक सलीके से बसा शहर था।फ़ैज़ाबाद और बंगाल,गुजरात, तेहरान,कंधार,लाहौर,दक्कन से लेकर दुनिया के कई हिस्सों के लोग यहाँ तालीम हासिल करने आया करते।कहाँ तक शहर फ़ैज़ाबाद का ज़िक्र करें।किस्से दर किस्से हैं।तारीख़ी इमारतें तारीख़ बयाँ करती हैं।

 

 

बहरहाल,अब सीधे बड़ी बुआ नाम की सूफ़ी संत महिला का ज़िक्र करते हैं जिनकी बददुआ फ़ैज़ाबाद को लगी।जब फ़ैज़ाबाद शहर से अयोध्या कस्बे की तरफ़ बढ़ा जाए तो सड़क से कुछ दक्खिन हटकर एक उजाड़ सी और बहुत बड़ी सी खंडहरनुमा मस्जिद पड़ती है,वहीं बड़ी बुआ के नाम से मशहूर सूफ़ी संत ख़ातून की कब्र है।बड़ी बुआ बहुत अल्लाह वाली थीं।हर वक़्त इबादत करती रहतीं।उनके नाम की बहुत धूम हो गई और हिंदू-मुस्लिम सब उनके दर पर आकर मन मांगी मुरादें पाने लगे।वो ख़ातून बड़ी बुआ के नाम से मशहूर हो गईं।ये महिला संत देखने में बहुत ख़ूबसूरत थीं।उनकी ख़ूबसूरती पर फ़ैज़ाबाद का शहर कोतवाल फ़िदा हो गया।कोतवाल ने फ़ैज़ाबाद के बड़े-बुज़ुर्ग़ों को आगे कर निकाह का पैग़ाम भेजा।बड़ी बुआ ने मना कर दिया।अब कोतवाल ज़बर्दस्ती शादी करने पर उतर आया।ये पता चलने पर बड़ी बुआ ने कोतवाल के पास संदेश भेजा कि ये बताइये कि मुझ फ़कीर में आपको क्या ख़ूबसूरती नज़र आयी कि आप जबरन शादी करने पर आमादा हैं।कोतवाल ने कहला भेजा कि आपकी आँखें मुझे बहुत पसंद हैं।ये सुनने के बाद सूफ़ी संत बड़ी बुआ ने अपने हाथों से अपनी दोनों आँखें निकालीं और एक पत्ते पर रखकर कोतवाल के पास भेज दीं और पैग़ाम भी भेजवा दिया कि ‘ तुझे जो चीज़ पसंद है वो हाज़िर है,मगर याद रखना कि फ़ैज़ाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना ज़ालिम ‘।कहते हैं उसी के बाद से फ़ैज़ाबाद शहर उजड़ना शुरू हो गया और नवाब आसफ़ुद्दौला ने फ़ैज़ाबाद की जगह लखनऊ को अपनी राजधानी बना लिया।फ़ैज़ाबाद तभी से उजड़ा हुआ शहर है।हम जब भी फ़ैज़ाबाद और उसके क़रीब के अयोध्या कस्बे गए तो वहाँ एक उचाट कर देने वाली अजीब सी ख़ामोशी पसरी नज़र आई।

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