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राजनीति

भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण के काट की जरूरत

इरशाद अली आजाद
इस वक्त देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है। एक तरफ नौजवानों को रोजगार नहीं मिल रहा है तो दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था लगातार गर्त में जा रही है। आतंकवाद से लेकर भ्रष्टाचार तक अपने चरम पर हैं। शिक्षा का बाजारीकरण करने की होड़ लगी है। घोटाले निरंतर हो रहे हैं। यह बात अलग है कि इन घोटालों से पर्दा उठाने वाली मीडिया अब इन घोटालों पर पर्दा डाले हुई है। बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा अब खोखला साबित हो रहा है। ऐसे में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए ना सिर्फ यह की सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है बल्कि अंधविश्वास के सहारे भारत के बहुत बड़े वर्ग यानी पिछड़े वर्ग को बरगला कर अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में है। जाहिर है इसके लिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार को धर्म का चोला पहनकर राजनीति साधने वाले लोगों की दरकार है। यही वजह है कि इस वक्त पूरे भारत में रोजी रोजगार भ्रष्टाचार शिक्षा सामाजिक सुरक्षा महिलाओं की सुरक्षा की बात ना करके सिर्फ सांप्रदायिक और भेदभाव की राजनीतिक पर फोकस किया जा रहा है।

 

दरअसल 9 साल से सत्ता में बनी भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि यह देश अब हमारे जुमलो से नहीं बल्कि हमारे काम की बुनियाद पर फैसला लेने की ओर बढ़ चला है। यह बात कर्नाटक में सिद्ध हो चुकी है की अब न तो जुमलों की सरकार चलेगी और ना ही हिंदू मुस्लिम की राजनीति। भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में हुई करारी हार के साथ ही दक्षिण के राज्यों से साफ हो चुकी है। आने वाले लोकसभा चुनाव में दक्षिण से भारतीय जनता पार्टी को अब कुछ मिलने वाला नहीं है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की नजर उत्तर भारतीयों पर टिक गई हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड पश्चिम बंगाल इत्यादि।

 

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता गण अब एक दूसरे माध्यम से उत्तर भारत के लोगों के ध्रुवीकरण की रणनीति के तहत काम कर रही है। इसके तहत उत्तर भारत के लोगों को धर्म की आड़ में उलझा कर राजनीतिक फायदा हासिल करने की कोशिश की जा रही है। शायद यही वजह है कि हाल ही में बिहार दौरे पर आए एक तथाकथित बाबा की शरण में पूरी भारतीय जनता पार्टी नतमस्तक थी। कहने को तो यह कथा कार्यक्रम था लेकिन इसके बहाने बिहार में राजनीतिक रोटी सेकने की भरपूर कोशिश की गई। वरना यह क्या जरूरी था कि एक धार्मिक कार्यक्रम को एक राजनीतिक पार्टी इतने जोर शोर और दमखम के साथ न सिर्फ प्रायोजित करती बल्कि इसके बहाने बिहार की सत्तारूढ़ सरकार को कटघरे में खड़ी करने की कोशिश करती।

 

 

आपको याद होगा कि पहले लोकसभा, विधानसभाओं के सदस्य अपने कामों के हवाले से छवि बनाते थे। आज की राजनीति में बहुत सारे नेता बाबाओं पर आश्रित हो गये। इसकी बानगी आप बिहार में बाबा बागेश्वर की यात्रा के दौरान बखूबी देख सकते हैं कि किस प्रकार से पूरी भारतीय जनता पार्टी बाबा के चरणों में नतमस्तक थी और अपना भविष्य तलाश कर रही थी। ऐसा ही कुछ हाल भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाले प्रदेश मध्य प्रदेश का भी है जहां विधानसभा चुनाव होना है। खबरों के अनुसार बीते छह महीने में भोपाल संभाग में 500 कथाओं के आयोजन हो चुके हैं, जिनमें राजधानी भोपाल में 20 कथा, अशोक नगर में 100, राजगढ़ में 150, गुना में 70, सीहोर में 80, रायसेन में 50 और विदिशा में 20 कथाओं का आयोजन हो चुका है।

कर्नाटक चुनाव में हुई करारी हार के बाद एक पल के लिए ऐसा माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी अब चुनाव में धर्म का सहारा लेना छोड़ देगी लेकिन बिहार में हाल की घटनाओं को देखकर ऐसा सोचना बिल्कुल निराधार होगा।कर्नाटक परिणाम के बाद बाबा बागेश्वर का पटना आना। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे, सांसद सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, मनोज तिवारी, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी जैसे नेताओं की उपस्थिति, कई सवाल खड़े करता है।

 

 

इसलिए अब देश को बड़े ही संयम और होशियारी के साथ इस बात पर ध्यान देना होगा कि देश रोजी रोजगार के अवसर भ्रष्टाचार पर नकेल बेहतर अर्थव्यवस्था और यहां वास करने वाले लोगों की सुरक्षा के साथ आगे बढ़ेगा न कि पाखंड और धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ। ऐसे में जरूरी है कि देशवासी अपनी जिम्मेदारी को बखूबी अदा करें और पाखंड और धार्मिक ध्रुवीकरण के बल पर कुर्सी का सपना देख रहे पार्टियों के चेहरे से नकाब उठा कर देश को तरक्की की राह पर ले जाने में अपना योगदान दें। इसके लिए हमें धार्मिक ध्रुवीकरण से अलग धर्मनिरपेक्ष देश और संविधान के प्रति आस्था की लौ जलानी होगी ताकि हमारा देश विकास के पथ पर अग्रसर हो सके।

(लेखक जनता दल यूनाइटेड के बिहार प्रदेश महासचिव और बिहार स्टेट शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन हैं।)

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