Nationalist Bharat
राजनीति

नीतीश कुमार अपनी पारी खेल चुके

तारिक़ अनवर चम्पारणी
मुझें एक बार किसी काम से आरसीपी सिंह से मिलना था। पटना में उनका अपना आवास नहीं था। वह जिस आवास में रहते थे शायद विधान परिषद सदस्य रणवीर नंदन को आवंटित था। उनके आवास पर पहुंचने के बाद पहले एक पर्ची लिखकर भेजना पड़ता था। उसके बाद उनसे मुलाक़ात होती थी। मैंने यह कल्चर केवल सचिवालय के सेक्रेटरी की ऑफिस में देखा था। किसी नेता के आवास पर यह पहली बार देखा। खैर, आरसीपी सिंह स्वयं भी पूर्व ब्यूरोक्रेट्स है इसलिए भी इस कल्चर को राजनिति में भी ढो रहे थे। ब्यूरोक्रेट का नेचर डेमोक्रेटिक कम और ऑटोक्रेट वाला ज्यादा होता है। इसलिए भी वह जनता को कनेक्ट नहीं कर पा रहे थे। नीतीश सत्ता तक पहुंचें उसमें आरसीपी का रत्ती भर योगदान नहीं है। बल्कि जॉर्ज फर्नांडिस, दिग्विजय सिंह, वशिष्ट नारायण सिंह और शरद यादव की सामूहिक मेहनत के परिणाम में उन्हें सत्ता मिली है। सत्ता प्राप्ति के बाद से आरसीपी जदयू में सक्रीय हुए है। इनकी सक्रियता का ही परिणाम है की जदयू से दिग्विजय, जॉर्ज और शरद यादव की छुट्टी हुई और आरसीपी सिंह छोटा साहब के नाम से जाने गये। यानी नीतीश कुमार बड़ा साहब और आरसीपी सिंह छोटा साहब हुए। जब नीतिश कुमार के नेतृत्व में 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी थी उस समय तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बनाये गये थे। उस समय बड़ा साहब के बाद तेजस्वी यादव छोटा साहब बने और आरसीपी सिंह असुरक्षित महसूस करने लगे। फिर उन्होंने महागठबंधन को तोड़ने की कवायद शुरु की और अन्ततः नीतिश कुमार भाजपा के गोद में जाकर बैठ गये। फिर प्रशान्त किशोर की बारी आयी। चूंकि प्रशान्त किशोर को पवन कुमारा वर्मा पटना लेकर आये थे और 2015 विधानसभा का काम किया था। वर्मा और आरसीपी दोनों ब्यूरोक्रेट्स थे इसलिए तालमेल नहीं बैठ पाया और अन्ततः पवन वर्मा की छुट्टी हो गयी और थोड़े दिनों बाद प्रशान्त किशोर को भी जाना पड़ा।

 

 

आरसीपी ने 2019 लोकसभा चुनाव की रणनीति और प्रचार की जिम्मेदारी प्रशान्त को नहीं दिया और मतभेद शुरु हो गये। एक आरसीपी ने इतने नेताओं का कैरियर खाया है। आज वह खुद जदयू से आउट हो गये है। जमीन वाले मामले में उलझाकर नीतीश कुमार ने उन्हें कही का नहीं छोड़ा है। वह अपनी पार्टी भी बना लेंगे फिर उनको बैसाखी की जरुरत है और वह बैसाखी उन्हें भाजपा से ही मिल सकती है। ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि आगामी लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार के बेहद करीबी और नालंदा से जदयू सांसद कौशलेंद्र के विरूद्ध भाजपा उन्हें समर्थन दे सकती है या उम्मीदवार बना सकती है। वैसे भी नीतिश कुमार अपनी राजनीतिक पारी खेल चुके है। बिहार के मुख्यमंत्री पद पर सबसे लंबे समय तक रहने का रिकॉर्ड बना चुके है। उन्हें भी पता है की अब ऐसा कुछ चमत्कार होने नहीं जा रहा है की वह प्रधानमंत्री आवास पहुंचें। इसलिए आरसीपी सिंह को अपनी चिंता करनी चाहिये।

बिहार की राजनीति:नीतीश कुमार के पाला बदलने की अटकलें!

मोहम्मद जफर हसन ऑल इंडिया ओलमा बोर्ड बिहार के प्रदेश उपाध्यक्ष मनोनित

Nationalist Bharat Bureau

जाति-धर्म से ऊपर सबके विकास की नीति पर काम कर रही सरकार : प्रमोद सावंत

Nationalist Bharat Bureau

आज काशी पहुंचेंगे भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, सी एम योगी करेंगे अगवानी, कल दोनों करेंगे गाजीपुर में जनसभा

cradmin

RBI ने कृषि लोन की सीमा बढ़ाकर 2 लाख रुपये की,छोटे किसानों को राहत

Nationalist Bharat Bureau

बुद्ध के अनुयायियों को सत्ता क्यों सुहाने लगी?

RJD के बाद अब ओवैसी प्रत्याशी की गिरफ्तारी से सियासी हलचल

Nationalist Bharat Bureau

अगर कांग्रेस में इतना दिवालियापन आ गया है कि उसे एक चुनावी रणनीतिकार की ज़रूरत पड़ रही है तो ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है

नालंदा लोकसभा:पिछले 28 वर्षों से जीत रहे हैं नीतीश की पार्टी के उम्मीदवार  

Potato-Onion Price Hike: एक बार फिर रुला सकते हैं आलू-प्याज के दाम

Leave a Comment