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राजनीति

भूमिहारों पर कांग्रेस इतना मेहरबान क्यों ?

अरविंद शर्मा
बिहार झारखंड के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कमान भी भूमिहार को सौंप दी है। इसे महज संयोग बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। प्रदेश अध्यक्ष जैसा पद किसी को सौंपने से पहले वोट के लिहाज से विचार किया जाता है। उसके अनुरूप ही रणनीति बनाई जाती है। लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस ने जातीय राजनीति के लिए ख्यात तीन राज्यों में अगर एक ही जाति पर भरोसा जताया है तो इसे प्रयोग एवं वोट बैंक की वापसी का प्रयास ही माना जाएगा। प्रत्यक्ष तौर पर जातिवादी राजनीति से परहेज करने का दावा करने वाली कांग्रेस ने यूपी में लगातार कई दांव आजमाने के बाद कमान अजय राय को दी है। बिहार में अखिलेश प्रसाद सिंह एवं झारखंड में राजेश ठाकुर का नेतृत्व है। तीनों भूमिहार हैं। एक अन्य राज्य अंडमान निकोबार की कमान भी वर्ष भर पहले तक इसी जाति के कुलदीप राय शर्मा के पास थी, जो मूल रूप से आजमगढ़ के रहने वाले हैं। सांसद बनने के बाद कुछ महीने पहले ही उनकी भूमिका में बदलाव किया गया है। चर्चित छात्र नेता रह चुके कन्हैया कुमार भी इसी जाति से आते हैं, जिन्हें एनएसयूआइ का प्रभारी बनाया गया है। कांग्रेस ने सारी नियुक्तियां दो वर्ष के भीतर की हैं, जो उसकी रणनीति की ओर इशारा करती है।

 

 

प्रश्न उठता है कि कांग्रेस ने रणनीति क्यों बदली? दरअसल, उसने यूपी में कई प्रयोग करके देख लिए, किंतु मुश्किलों का अंत नहीं हो सका। वैसे तो भूमिहारों की सबसे ज्यादा संख्या और सामर्थ्य बिहार में है। इस लड़ाकू जाति की संघर्ष की क्षमता भी अग्रणी है। पूर्वांचल की कई सीटों पर भूमिहार एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में त्यागी वोटर प्रभावशाली हैं। कभी बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह एवं उत्तर प्रदेश में महावीर त्यागी जैसे बड़े और प्रभावशाली नेता जवाहरलाल नेहरू के रणनीतिकारों में होते थे। इंदिरा गांधी के जमाने में यह कमान कल्पनाथ राय, ललितेश्वर प्रसाद शाही एवं गौरीशंकर राय ने संभाली और भूमिहार वोटरों को काफी हद तक कांग्रेस के साथ बांधे रखा। किंतु मुलायम सिंह यादव एवं लालू प्रसाद के उत्थान के बाद इस जाति का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। बिहार में कांग्रेस को इस जाति की ओर से अंतिम नेतृत्व रामाश्रय प्रसाद सिंह ने दिया, लेकिन वर्ष 2000 में राजद के विरुद्ध लड़कर 24 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने सत्ता के लिए राबड़ी देवी सरकार से हाथ मिला लिया। यूपी में ऐसा 1990 में ही हो चुका था।

 

 

मंडल आंदोलन के बाद कांग्रेस ने चाल बदलकर सवर्णों को और अधिक नाराज कर लिया, जो उसकी राजनीति के लिए आखिरी कील साबित हुआ। यह वही दौर था जब संयुक्त बिहार-झारखंड में कैलाशपति मिश्र के नेतृत्व में भाजपा का उभार हो रहा था। लिहाजा राजनीतिक सम्मान और विकल्प की तलाश में भूमिहार समाज भाजपा की ओर प्रस्थान कर गया। हालांकि, इसका सिलसिला वर्ष 1969 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस के पहले बड़े विभाजन के दौरान ही प्रारंभ हो गया था, जब शीर्ष क्रम के कई बड़े भूमिहार नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था। बहरहाल, कांग्रेस फिर पुराने रास्ते पर बढ़ती दिख रही है।

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