पटना:पटना के रहने वाले साहित्यकार औऱ ‘पाखी’ तथा ‘भवन्ति’ जैसी पत्रिकाओं के संपादक प्रेम भारद्वाज की उपन्यास ‘मन भीतर श्मशान’ का लोकार्पण रविवार को बापू टावर में किया गया। ‘अन्तर्लिपि’ प्रकाशन द्वारा यह उपन्यास प्रेम भारद्वाज की मौत के छह साल बाद उनके मित्रों व परिजनों के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इस मौके पर पटना शहर के कवि, साहित्यकार, प्रोफ़ेसर आदि मौजूद थे। लोकार्पण करने वालों में प्रमुख थे प्रख्यात कवि आलोकधन्वा, पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो तरुण कुमार, कथाकार संतोष दीक्षित , कवि व मनोचिकित्सक डॉ विनय कुमार, हिंदी की असिस्टेंट प्रोफेसर अनिशा तथा ‘पाखी’ के वर्तमान संपादक पंकज शर्मा तथा बापू टावर के निदेशक विनय कुमार।कार्यक्रम का संचालन मौलाना मज़हरुल हक अरबी फारसी विश्विद्यालय में प्राध्यापक व कवि निखिल आनंद गिरि ने किया।
परिचर्चा की शुरुआत करते हुए पंकज शर्मा ने कहा ” जब प्रेम भारद्वाज ‘पाखी’ का राजेन्द्र यादव विशेषांक निकाल रहे थे तब उन्होंने जोड़ा था। प्रेम भारद्वाज की मौत के छह साल बाद इस उनके लिखे को किताब बनाया यह बहुत बड़ी बात है। प्रेम जी कोई चीज आठ-दस बार लिखकर ठीक करते थे। यदि प्रेम जी जीवित रहते तो ‘मन भीतर शमशान’ रखते शायद रहते तो मन भीतर चाँद या आग या बेलछी रखते। इस किताब में वह सारा प्रसंग आता है की कैसे इंदिरा गाँधी आई थी। प्रेम जी को मैंने गला फाड़ कर रोते देखा था वे कहा करते थे की जो रोयेगा नहीं तो वह मनुष्य नहीं होगा। उनमें मुक्तिबोध की तरह का व्यक्तित्व था उनका।
पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो तरुण कुमार ने अपने संबोधन में कहा ” मैं जब पटना कॉलेज में नया नया ही प्राध्यापक बने थे तब प्रेम भारद्वाज एम.ए के छात्र बनकर आये थे। यह मेरे लिए भावुक क्षण है। उनमें प्रखर सामाजिक – राजनीतिक होने के साथ-साथ अच्छी साहित्यिक सूझ बूझ थी। उनके कथा संग्रह पहले प्रकाशित हो चुका था। बाहर का श्मशान इतना अधिक है कि यदि वह मन के अन्दर आ जाती है तो कितनी भयावह बात है। इस रचना के रूप का सवाल है कि कहानी, उपन्यास, रोमांच आदि सबकुछ है किसी एक की कैद में नहीं रखा जा सकता। मुक्तिबोध को भयानक खबर के कवि कहा गया इससे संबंधित कई बातें प्रेम भारद्वाज के यहां उपस्थित है। बेलछी प्रेम भारद्वाज को बहुत हॉंट करता रहता है। बार -बार यह मुहावरे के रूप में आता है। 1977 से लेकर 2017 तक के कालखंड को सामने लाया गया है। इस दौर के दुःस्वप्न कड़क और कौंध के साथ आता है। प्रेम भारद्वाज ने लिखा है ‘दुनिया के ग्लोब पर रक्त के इतने छींटे पड़े हैं की देशों के नाम छिप गए हैं’। ऐसे हौलनाक दृश्य इस उपन्यास में है। यह कबीर की भाषा किस खौलते मस्तिष्क से निकला होगा यह कल्पना की जा सकती है। उनको पढ़ते हुए प्रेमचंद, मुक्तिबोध, विनोद कुमार शुक्ल सभी याद आते रहते हैं।

बातचीत को आगे बढाते हुए ने कथाकार संतोष दीक्षित ने कहा ” बेलछी की आग पूरे उपन्यास में फैली हुई है। बेलछी की चिंता स्थाई बनी हुई है। बेलछी के बहाने सेनारी और मियांपुर जैसे नरसंहारों का जिक्र है। लेखक की स्मृतियों में कौंधती रहती है। यह एक मनोवैज्ञानिक, अस्तित्वादी उपन्यास है साथ ही प्रेमकथा भी है। प्रेम का इंतज़ार है। यह टूटा, बिखरा बिना तारतम्य का उपन्यास है। यह बाहरी घटनाओं से अधिक नायक की स्मृतियां छाई रहती हैं। रक्त और हिंसा के बीच प्रेम की बलवती इच्छा रेखांकित करने योग्य है। मिलन से अधिक अस्तित्व की अनुभूति है। बाहरी हिंसा के बदले अंदर को ढूंढने के दो ध्रुवों पर केंद्रित हैं। विचार कथानक पर हावी है फिर भी यह बड़ा उपन्यास है। उपन्यास एक खास बिंदु पर केंद्रित है। इसे पढ़ते हुए सैमुएल बैकेट और अल्बेयर कामू की याद आती है।
वैशाली महिला कॉलेज में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफेसर अनिशा ने कई उदाहरण देते हुए बताया ” यह इस उपन्यास को पढ़ते हुए जॉर्ज ऑरवेल की याद आती है। यह उपन्यास प्रेम, प्रेम का इंतज़ार और इंतज़ार में पत्थर हो जाना है। नायक स्मृतियों में पीछे जाता है। 16 जून 2000 को जब मियांपुर नरसंहार की घटना घटती है तब एक रिपोर्टर जाता है जहां उसे एक स्त्री से भेंट होती है और फिर उसी से रिपोर्टर को प्रेम हो जाता है। नायक अपने अंदर धधकते आग को पाता है। मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ में की रक्तपुरुष से बातचीत होती है। बाहर घट रही घटनाएं हमारे अंदर संवेदना को मार रही है और इसी के कारण मन के अंदर श्मशान है। प्रेम भारद्वाज सामाजिक सरोकार से जुड़े रहे हैं मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।
चर्चित कवि व मनोचिकित्सक डॉ विनय कुमार ने अपने पकई संस्मरण सुनाते हुए कहा ” प्रेम भारद्वाज से मेरी मुलाकात 1990 के आसपास हुआ था। कुमार मुकुल हमदोनों के बीच सेतु बने। जब आलोकधन्वा पर अंक आया तो प्रेम जी ने मुझे लिखने को कहा। हर दो दिन पर प्रेम जी का फोन आता रहा कि कुछ बात आगे बढ़ी। सबसे पहले आलोकधन्वा की कविता पर लिखा था। प्रेम भारद्वाज में एक साहस था । ‘पाखी’ को लेकर कई कंट्रोवर्सी भी हुई। लेकिन वे सब झेलते रहे। उन्होंने जब ‘भवन्ति’ पत्रिका निकाली तो इस दौरान उनसे भेंट हुई। इस उपन्यास को कैसे पढ़ा जाये इसकी तरकीब बताई गई है। प्रेम भारद्वाज ने इस उपन्यास को फ़िल्म स्क्रिप्ट की तरह लिखा था। इस उपन्यास में दृश्यात्मकता भरी पड़ी है। एक पाठक के रूप में जो कोई भी इसे उठाएगा तो उसे बहुत कुछ मिलेगा। इनकी अंतरात्मा के स्लाइसेज हैं इसमें। कोई भी उपन्यास आपकी ही चेतना का विस्तार होता है। नए लेखकों को यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए।अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने कहा ” प्रेम भारद्वाज पर आज बहुत अच्छी बातचीत आयोजित की गई। इसे सजिल्द छापने की जरूरत है। प्रेम बहुत अच्छे और मेहनती आदमी थे। प्रेम भारद्वाज को याद कर रुलाई आती है।दूसरी पत्रिका का नाम कितना अच्छा था ‘भवन्ति’। अच्छे लोग जब असमय गुजर जाते हैं तो पीड़ा होती है। धन्यवाद ज्ञापन अन्तर्लिपि प्रकाशन की ज़ीनत उल खुशबू ने किया।
इस लोकार्पण समारोह में मौजूद लोगों में प्रमुख थे संजय कुमार कुंदन, अरुण सिंह, कुमार मुकुल, अजय पांडे, जयप्रकाश, अनीश अंकुर , विनोद अनुपम, रविशंकर उपाध्याय, कृष्ण समिधा, प्रत्युष मिश्र, प्रेम भारद्वाज की बहन पूनम शर्मा, भाई अरुण शर्मा, बहनोई उमेश राय, व भतीजा निरंजन शर्मा, रौशन प्रकाश , राजेश भट्ट, गौरव अनन्या, डॉ अंकित, अमरनाथ, मणिभूषण कुमार, चंद्रबिंद सिंह, जमशेद आलम, तपेश्वर , अभिषेक विद्रोही, सूरज यादव, कुमार मंगलम रणवीर, रविकिशन आदि।

