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पहाड़ भी तपने लगे हैं तो कहां जाइयेगा?

वो जो हर साल करोड़ों पेड़ लगाए जाते हैं, वे कहां हैं? वे तो नहीं दिखते, लेकिन लाखों करोड़ों पेड़ विकास के नाम पर कटते हुए जरूर दिखते हैं। विकास के लिए सबसे पहले पेड़ों की बली ली जाती, फिर गरीब गुरबाओं के घर दुकान तोड़े जाते हैं। कारीडोर बनाने के लिए न जाने कितने लोगों के घर तोड़ दिए गए और सीने पर विकास पुरुष का ठप्पा चस्पा कर लिया गया। जिन सड़कों के दोनों तरफ घने पेड़ हुआ करते थे, उन्हें फोर लेन, सिक्स लेन और एक्सप्रेस वे बनाने के लिए पेड़ों को काट दिया गया। टोल लगाकर जनता को लूटा जाने लगा। जनता खुश है, सड़कों पर फर्राटा भरते हुए, लेकिन किस कीमत पर? अभी पारा पचास तक पहुंचा है, साठ होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा, क्योंकि पेड़ काटने का काम बहुत तेज हो गया है। पहाड़ों पर पहले पंखे नहीं होते थे। पहले पंखे और कूलर लगे, फिर एसी लगने लगे। पहाड़ों का तापमान लगातार बढ़ रहा है। वहां जल्दी ही पारा बेइंतहा बढ़ेगा। विकास की कीमत अदा करनी पड़ेगी। अभी गर्मी से राहत के लिए पहाड़ों की और दौड़ते हैं। पहाड़ों पर लोगों का हुजूम पहाड़ों को नष्ट कर रहा है। पहाड़ भी तपने लगे हैं तो कहां जाइयेगा?

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