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रुन्नीसैदपुर विधानसभा सीट:जनता हमेशा “बदलाव” की राजनीति में विश्वास रखती आई है

रुन्नीसैदपुर विधानसभा सीट बिहार की उन सीटों में से एक है, जो हर बार सत्ता की दिशा का संकेत देती है। यहां का चुनावी परिणाम न सिर्फ सीतामढ़ी बल्कि पूरे मिथिलांचल की राजनीतिक हवा को दर्शाता है। 2025 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पंकज मिश्रा अपनी सीट बचा पाएंगे या आरजेडी पुनः वापसी करेगी — क्योंकि रुन्नीसैदपुर की जनता हमेशा “बदलाव” की राजनीति में विश्वास रखती आई है।

बिहार के सीतामढ़ी जिले में स्थित रुन्नीसैदपुर विधानसभा सीट राजनीति के लिहाज से एक बेहद दिलचस्प क्षेत्र रही है। यह सीट न सिर्फ स्थानीय समीकरणों से प्रभावित होती है, बल्कि राज्य की व्यापक राजनीतिक लहरों का भी सटीक प्रतिबिंब पेश करती है। यह सीट सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और कई बार यहां हुए चुनावों ने यह दिखाया है कि जनता किस तरह समय के साथ अपने रुख़ में बदलाव करती रही है।

रुन्नीसैदपुर का राजनीतिक इतिहास 1977 के ऐतिहासिक आम चुनावों से जुड़ा हुआ है। उस समय देश में इमरजेंसी के बाद जनता का गुस्सा कांग्रेस के खिलाफ चरम पर था। इसी लहर में जनता पार्टी के नवल किशोर शाही ने यहां जीत दर्ज की थी। उस दौर में यह जीत महज एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बहाली के लिए जनता के जोश की प्रतीक थी।लेकिन आने वाले वर्षों में यह सीट कई बार राजनीतिक दलों के बीच झूलती रही — कभी कांग्रेस, कभी जेडीयू, तो कभी आरजेडी। इससे स्पष्ट होता है कि यहां की जनता किसी एक दल के प्रति स्थायी रूप से प्रतिबद्ध नहीं रही है, बल्कि वह समय और मुद्दों के अनुसार अपना निर्णय लेती आई है।

2015 के विधानसभा चुनाव में इस सीट ने एक नया मोड़ लिया। लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद (RJD) ने सामाजिक समीकरणों और संगठनात्मक मजबूती के सहारे इस सीट को अपने पाले में किया। मंगिता देवी यादव की जीत ने न केवल क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया, बल्कि यादव-मुस्लिम समीकरण के प्रभाव को भी पुनः स्थापित किया। उस समय महागठबंधन की लहर पूरे बिहार में थी, और रुन्नीसैदपुर ने भी उस लहर का हिस्सा बनकर आरजेडी को समर्थन दिया।

2020 के चुनाव में राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ी टक्कर में जेडीयू के पंकज कुमार मिश्रा ने जीत हासिल की। यह जीत इस बात का प्रमाण थी कि नीतीश कुमार की विकास योजनाएं और शासन की स्थिरता ने मतदाताओं को प्रभावित किया।हालांकि आरजेडी की पकड़ पूरी तरह कमजोर नहीं हुई थी, परंतु एनडीए के संगठित रणनीतिक प्रबंधन और बूथ स्तर तक मजबूत पकड़ ने निर्णायक भूमिका निभाई। यहां मतदाता जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास और स्थानीय नेतृत्व की छवि को भी महत्व देते दिखे।

वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए, आने वाले चुनावों में रुन्नीसैदपुर सीट पर फिर से कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। आरजेडी एक बार फिर अपनी पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि जेडीयू विकास और सुशासन के एजेंडे पर भरोसा जता रही है। वहीं, बीजेपी की सक्रियता भी इस क्षेत्र में बढ़ी है, जिससे त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।यह कहना गलत नहीं होगा कि रुन्नीसैदपुर की जनता हर चुनाव में बदलाव की भूमिका निभाती है। यहां का मतदाता न तो पूरी तरह जातीय है, न ही पूरी तरह वैचारिक — बल्कि वह अपने अनुभव, उम्मीद और स्थानीय मुद्दों के आधार पर फैसला करता है।

रुन्नीसैदपुर विधानसभा सीट बिहार की उन सीटों में से एक है, जो हर बार सत्ता की दिशा का संकेत देती है। यहां का चुनावी परिणाम न सिर्फ सीतामढ़ी बल्कि पूरे मिथिलांचल की राजनीतिक हवा को दर्शाता है। 2025 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पंकज मिश्रा अपनी सीट बचा पाएंगे या आरजेडी पुनः वापसी करेगी — क्योंकि रुन्नीसैदपुर की जनता हमेशा “बदलाव” की राजनीति में विश्वास रखती आई है।

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