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सीएलएनयू और कॉफ्फेड के बीच ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

समझौते का मुख्य उद्देश्य बिहार में मत्स्य पालन, मखाना, सिंघाड़ा तथा पारंपरिक मछुआरों की आजीविका से जुड़े क्षेत्रों में कानूनी एवं नीतिगत शोध, संस्थागत सुधार, सहकारी शासन व्यवस्था को मजबूत करना, क्षमता निर्माण तथा साक्ष्य-आधारित सिफारिशें विकसित करने हेतु एक संस्थागत ढांचा तैयार करना है।

 

पटना: चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (सीएलएनयू), पटना और बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (कॉफ्फेड), पटना के बीच आज एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते पर सीएलएनयू के कुलपति प्रो. (डॉ.) फैज़ान मुस्तफा और कॉफ्फेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने हस्ताक्षर किए।इस अवसर पर आयोजित समारोह में सीएलएनयू की ओर से नोडल अधिकारी श्री विश्वम प्रकाश जबकि कॉफ्फेड की ओर से निदेशक-सह-मानव संसाधन प्रबंधक सुश्री सिमरन और निर्यात प्रबंधक श्री रवि राज उपस्थित रहे।इस समझौते का मुख्य उद्देश्य बिहार में मत्स्य पालन, मखाना, सिंघाड़ा तथा पारंपरिक मछुआरों की आजीविका से जुड़े क्षेत्रों में कानूनी एवं नीतिगत शोध, संस्थागत सुधार, सहकारी शासन व्यवस्था को मजबूत करना, क्षमता निर्माण तथा साक्ष्य-आधारित सिफारिशें विकसित करने हेतु एक संस्थागत ढांचा तैयार करना है।

समारोह के दौरान दोनों संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने इस एमओयू के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिहार में तालाब, आहर, पईन, चौर, मौन, नदी, जलाशय और अन्य जलीय संसाधनों की अपार संभावनाएं हैं, परंतु संस्थागत विखंडन, अल्प-उपयोग, अतिक्रमण, वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी, ऋण एवं बीमा सुविधाओं में कमी तथा प्रसंस्करण एवं विपणन ढांचे की कमजोरी के कारण इस क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। यह एमओयू इन्हीं चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक ठोस कदम है।दोनों पक्षों ने इस अवसर पर यह भी रेखांकित किया कि इस सहयोग का अंतिम लक्ष्य है कृ ष्पारंपरिक मछुआरों को केंद्र में रखकर समावेशी जलीय आर्थिक विकास सुनिश्चित करना, जिससे बिहार मत्स्य उत्पादन, मखाना एवं सिंघाड़ा प्रसंस्करण तथा सहकारी प्रबंधन के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बन सके।

इस एमओयू के तहत सीएलएनयू और कॉफ्फेड निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों में संयुक्त रूप से कार्य करेंगे:कानूनी एवं नीतिगत शोध: मत्स्य पालन, जलकर प्रबंधन, आर्द्रभूमि शासन, सहकारी शासन और पारंपरिक मछुआरों के अधिकारों से संबंधित मौजूदा कानूनों, नियमों और सरकारी योजनाओं का व्यवस्थित अध्ययन। सहकारी संस्थागत सुदृढ़ीकरण: मत्स्य सहकारी समितियों के लेखा-परीक्षा अनुपालन, वित्तीय प्रबंधन, चुनाव व्यवस्था और नेतृत्व क्षमता को मजबूत बनाना। जल-संसाधन शासन अध्ययन: सार्वजनिक जल निकायों के स्वामित्व, प्रबंधन, उपयोग और नवीनीकरण से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन कर संस्थागत सुधार हेतु सुझाव। सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन: प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, पीएमएमकेएसएसवाई, मत्स्य किसान क्रेडिट कार्ड, एनसीडीसी, नबार्ड, जैसी योजनाओं की क्रियान्विति की समीक्षा। अंतर-राज्यीय तुलनात्मक अध्ययन: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, ओडिशा सहित अग्रणी मत्स्य राज्यों के साथ बिहार के प्रदर्शन की तुलना। वित्तीय समावेशन एवं जोखिम सुरक्षा: मछुआरों, जलकृषि और मखाना उत्पादकों हेतु ऋण एवं बीमा तंत्र पर अध्ययन। उत्पादन एवं मूल्य संवर्धन: मत्स्य, मखाना और सिंघाड़ा उत्पादकता बढ़ाने तथा प्रसंस्करण, ब्रांडिंग व विपणन ढांचे को सुदृढ़ करना। पारंपरिक मछुआरा कल्याण: शिक्षा, कौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन हेतु उपाय। पर्यावरणीय स्थिरता: गंगा डॉल्फिन संरक्षण, नदी एवं आर्द्रभूमि संरक्षण तथा प्रदूषण जैसे विषयों पर अध्ययन।

 

इस सहयोग के क्रियान्वयन हेतु एक संयुक्त संचालन समिति गठित की जाएगी, जो प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान, वार्षिक कार्य योजना तैयार करने और प्रगति की समीक्षा का कार्य करेगी। यह समिति प्रत्येक तिमाही में कम से कम एक बार बैठक करेगी।प्रथम वर्ष में दोनों संस्थाएं आठ प्राथमिकता अध्ययनों पर कार्य करेंगी, जिनमें जल निकाय प्रबंधन, मत्स्य सहकारी समितियों में सुधार, सरकारी योजना प्रदर्शन, तालाब अतिक्रमण एवं नवीनीकरण, नदी मत्स्य संरक्षण, मखाना एवं सिंघाड़ा विकास तथा पारंपरिक मछुआरा कल्याण जैसे विषय शामिल हैं।यह एमओयू पांच वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा और आपसी सहमति से इसे आगे बढ़ाया जा सकेगा। इस अवसर पर दोनों संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने विश्वास व्यक्त किया कि यह साझेदारी बिहार के जलीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी और पारंपरिक मछुआरा समुदाय के जीवन-स्तर में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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